अमेरिका एक बार फिर अपने वादे से मुकर गया!!

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अमेरिका एक बार फिर अपने वादे से मुकर गया!!

इतिहास गवाह है कि वास्तविक इस्लाम के मुजाहिद कभी दुश्मन के सामने सिर नहीं झुकाते। उनका संबंध कर्बला से जुड़ा हुआ है। कर्बला वालों ने दुश्मन के सामने अपने सिर तो कटवा दिए, लेकिन कभी अपना सिर नहीं झुकाया।

लेखकः सैय्यद ताहिर अल-मूसवी

 अमेरिका और ईरान के बीच दो महीने तक जारी तनावपूर्ण युद्ध के बाद "शैतान-ए-बुज़ुर्ग" अपनी हार को छिपाने के लिए परेशान था। इस उद्देश्य से उसने पाकिस्तान सहित कई देशों से मध्यस्थता की अपील की। अंततः दोनों पक्ष युद्धविराम के लिए सहमत हुए और बातचीत की मेज़ पर आने का फैसला किया। यह तय हुआ कि वार्ता इस्लामाबाद में होगी।

लेकिन इस्लामाबाद पहुंचने के बाद अमेरिका अपने उद्देश्यों को हासिल करने में असफल रहा। बातचीत बिना किसी परिणाम के समाप्त हुई और दोनों पक्ष अपने-अपने देशों को लौट गए।

इसके बाद अमेरिका की कोशिशों और मध्यस्थों के लगातार प्रयासों के परिणामस्वरूप एक बार फिर बातचीत का रास्ता तैयार हुआ। इस दौरान अमेरिका की ओर से ईरान पर लगी कुछ पाबंदियां हटाने के वादे भी किए गए, लेकिन जैसे ही रहबर-ए-मुअज़्ज़म के अंतिम संस्कार और दफन का दृश्य दुनिया के सामने आया और लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी, तो "शैतान-ए-बुज़ुर्ग" परेशान हो उठा।

जनता के उत्साह और ईमानी शक्ति को देखकर वह एक बार फिर अपने किए हुए वादों से मुकर गया और ईरान पर दोबारा युद्ध थोप दिया। इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ़ हो गई कि उनकी दृष्टि में इस्लाम और मुसलमानों का भला नहीं चाहने वाले लोग वादाखिलाफी और धोखे का रास्ता अपनाते हैं।

दूसरी ओर इतिहास गवाह है कि वास्तविक इस्लाम के योद्धा कभी दुश्मन के सामने आत्मसमर्पण नहीं करते। उनका संबंध कर्बला से जुड़ा हुआ है। कर्बला के लोगों ने दुश्मन के सामने अपने सिर तो कुर्बान कर दिए, लेकिन कभी अपना सिर नहीं झुकाया।

यही शिक्षा आज भी मुसलमानों के लिए मार्गदर्शक है। वादाखिलाफी "शैतान-ए-बुज़ुर्ग" की पुरानी नीति बताई जाती है। बातचीत, वादे और समझौते उसके लिए केवल अस्थायी साधन हैं, जिन्हें वह आवश्यकता के समय इस्तेमाल करके छोड़ देता है। इसलिए उम्मत को चाहिए कि वह दुश्मनों की चालों को समझे और अपने ईमान तथा एकता को और अधिक मजबूत बनाए।

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