आयतुल्लाह आगा मुज्तबा तेहरानी (रह.) ने अपने एक अख़लाक़ी (नैतिक) व्याख्यान में इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.) की एक हदीस का उल्लेख करते हुए धन-दौलत तथा पद-प्रतिष्ठा के प्रति अत्यधिक मोह के विनाशकारी प्रभावों से सावधान किया है।
इंसान अक्सर बाहरी दुश्मनों से तो डरता है, लेकिन अपने आंतरिक दुश्मनों से गाफ़िल रहता है। धन की लालसा और पद-प्रतिष्ठा का अत्यधिक मोह इंसान के ईमान और दीन को भीतर से खोखला कर सकता है।
आयतुल्लाह आगा मुज्तबा तेहरानी (रह.) ने इस सत्य को इमाम बाक़िर (अ.स.) की एक शिक्षाप्रद हदीस के माध्यम से स्पष्ट किया है।
मुहम्मद बिन मुस्लिम, इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.) से रिवायत करते हैं कि आपने फ़रमाया:
«مَا ذِئْبَانِ ضَارِیَانِ فِی غَنَمٍ لَیْسَ لَهَا رَاعٍ هَذَا فِی أَوَّلِهَا وَ هَذَا فِی آخِرِهَا بِأَسْرَعَ فِیهَا مِنْ حُبِّ الْمَالِ وَ الشَّرَفِ فِی دِینِ الْمُؤْمِنِ»؛ (الکافی، ج ۲، ص ۳۱۵؛ بحارالأنوار، ج ۷۰، ص ۲۴)
जिस भेड़ों के झुंड का कोई चरवाहा न हो, यदि उस पर दो खूंखार भेड़िए—एक आगे से और दूसरा पीछे से—हमला कर दें, तो वे उसे उतनी तेजी से नष्ट नहीं कर सकते, जितनी तेजी से धन और प्रतिष्ठा की मोहब्बत एक मोमिन के दीन को बर्बाद कर देती है।
(अल-काफ़ी, खंड 2, पृष्ठ 315; बिहारुल अनवार, खंड 70, पृष्ठ 24)
इमाम बाक़िर (अ.स.) इस हदीस में पहले एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, फिर उसके माध्यम से वास्तविक संदेश समझाते हैं।
कल्पना कीजिए कि भेड़ों का एक झुंड है, जिसका कोई चरवाहा नहीं है। ऐसे में दो खूंखार भेड़िए एक आगे से और दूसरा पीछे से—उस झुंड पर हमला कर देते हैं और उसे नष्ट करना शुरू कर देते हैं। लेकिन इमाम (अ.स.) फ़रमाते हैं कि इन दोनों भेड़ियों का हमला भी उतना विनाशकारी नहीं होता, जितना धन और पद की अंधी मोहब्बत एक मोमिन के दीन और आध्यात्मिक जीवन के लिए होती है।
यह हदीस हमें सिखाती है कि यदि इंसान धन और पद को अपना उद्देश्य बना ले, तो उसका ईमान, नैतिकता और आध्यात्मिक जीवन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। इसलिए मोमिन को चाहिए कि वह सांसारिक साधनों का उपयोग करे, लेकिन उन्हें अपने दिल पर हावी न होने दे।













