ईरानी मिसाइलों के डर से पीछे हटे अमेरिकी युद्धपोत

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ईरानी मिसाइलों के डर से पीछे हटे अमेरिकी युद्धपोत

एशिया डिफेंस सिक्योरिटी नामक सुरक्षा वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की मिसाइल क्षमता के कारण अमेरिकी युद्धपोत नाकाबंदी की पूर्व निर्धारित रेखा से पीछे हट गया हैं। सुरक्षा वेबसाइट एशिया डिफेंस सिक्योरिटी ने लिखा है कि 5 सितंबर को ईरान के मिसाइल हमले के बाद अमेरिकी विमानवाहक पोत और युद्धपोत कथित तौर पर ओमान सागर के निकट अपने पहले के ठिकानों को छोड़कर अरब सागर के अधिक दूर स्थित क्षेत्रों में चला गया हैं।

एशिया डिफेंस सिक्योरिटी नामक सुरक्षा वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की मिसाइल क्षमता के कारण अमेरिकी युद्धपोत नाकाबंदी की पूर्व निर्धारित रेखा से पीछे हट गया हैं। सुरक्षा वेबसाइट एशिया डिफेंस सिक्योरिटी ने लिखा है कि 5 सितंबर को ईरान के मिसाइल हमले के बाद अमेरिकी विमानवाहक पोत और युद्धपोत कथित तौर पर ओमान सागर के निकट अपने पहले के ठिकानों को छोड़कर अरब सागर के अधिक दूर स्थित क्षेत्रों में चला गया हैं।

यह बदलाव इस बात का संकेत हो सकता है कि, वॉशिंगटन अपने युद्धपोतों की ईरान की मिसाइल क्षमता के सामने संभावित असुरक्षा को लेकर चिंतित है। सेंटिनल-2 उपग्रह की तस्वीरों के आधार पर रिपोर्ट में कहा गया है कि जॉर्ज वॉशिंगटन, जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश और बॉक्सर नामक अमेरिकी विमानवाहक पोत तथा उनके साथ मौजूद विध्वंसक जहाज अब उस क्षेत्र में दिखाई नहीं दे रहे हैं, जिसे पहले अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी की रेखा के रूप में पहचाना गया था।

हालांकि, ये साक्ष्य अपने आप में यह साबित नहीं करते कि, इन युद्धपोतों ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड के संचालन क्षेत्र को छोड़ दिया है। बाद की रिपोर्टों में इनके अरब सागर में मौजूद होने की बात सामने आई है।

अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने 5 सितंबर को पुष्टि की थी कि एक अमेरिकी विमानवाहक पोत और एक विध्वंसक जहाज़ को ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों ने निशाना बनाया था और वे इन हमलों से बच निकलने में सफल रहे। ईरान ने इस मिसाइल को «कासिम बसीर» बताया है और इसकी मारक क्षमता लगभग 1,200 किलोमीटर होने का दावा किया है। हालांकि, मिसाइल के वास्तविक प्रकार और उसके अमेरिकी युद्धपोत से टकराने की बात की स्वतंत्र स्रोतों से पुष्टि नहीं हुई है।

युद्धपोतों की स्थिति में यह बदलाव ईरान के लिए परिचालन परिस्थितियों को भी अधिक कठिन बना सकता है, क्योंकि अधिक दूर के क्षेत्र में तैनाती से अमेरिकी युद्धपोतों का पता लगाना और उन्हें निशाना बनाना अधिक जटिल हो जाता है। हालांकि, अमेरिका के लिए भी अधिक दूरी का अर्थ है कि उसे हवा में अधिक बार ईंधन भरने की आवश्यकता होगी, विमानों के उड़ान मार्ग लंबे होंगे और सैन्य अभियानों के बीच समन्वय अधिक कठिन हो सकता है।

कुल मिलाकर, उपलब्ध साक्ष्य अरब सागर में अमेरिकी नौसैनिक अभियानों के जारी रहने की ओर संकेत करते हैं। साथ ही, वे मिसाइल हमले के बाद अमेरिकी युद्धपोतों की स्थिति में बदलाव की संभावना भी सामने रखते हैं। यह बदलाव इस बात का संकेत हो सकता है कि वॉशिंगटन ईरान की मिसाइल क्षमता के सामने अपने सैन्य बलों की संभावित असुरक्षा को कम करने के लिए अपनी तैनाती में बदलाव कर रहा है।

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