संयुक्त राष्ट्र की बैठक बेनतीजा भाषणों के लिए एक मंच है: सय्यद सदरूद्दीन क़बांची

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संयुक्त राष्ट्र की बैठक बेनतीजा भाषणों के लिए एक मंच है: सय्यद सदरूद्दीन क़बांची

हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन सय्यद सदरूद्दीन क़बांची ने कहा कि इराक की ओर से इन प्रतिबंधों का जवाब देना हमारे इराकी हित में नहीं है। इसलिए हम सरकार से इन प्रतिबंधों की समीक्षा करने का अनुरोध करते हैं।

 नजफ़-ए-अशरफ़ के इमामे जुमा हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन सय्यद सदरुद्दीन क़बांची ने नजफ़-ए-अशरफ़ की हुसैनिया-ए-आज़म फ़ातिमिया में दिए गए जुमा के ख़ुत्बे में इराक और क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए।

संयुक्त राष्ट्र की बैठक से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि यह केवल बेनतीजा भाषणों के लिए एक मंच है

नजफ़-ए-अशरफ़ के इमामे जुमा ने कहा कि इज़राइली शासन के प्रमुख नेतन्याहू के भाषण के दौरान संयुक्त राष्ट्र महासभा से 80 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों का बाहर निकल जाना ऐसी घटना थी, जिससे नेतन्याहू आश्चर्यचकित रह गए और इस दृश्य से उन पर गुस्सा हावी हो गया। यह दृश्य विश्व जनमत में हमारी जीत को दर्शाता है, क्योंकि इससे यह बात स्पष्ट हुई कि इज़राइली शासन केवल एक अवैध अस्तित्व ही नहीं, बल्कि एक आतंकवादी अस्तित्व भी है, जो हत्या और नरसंहार पर आधारित है।

उन्होंने आगे कहा कि संयुक्त राष्ट्र की बैठक से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि यह केवल बेनतीजा भाषण देने का एक मंच है। यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, जिसने इज़राइली शासन के प्रमुख की निंदा की, उसे भी अमेरिका के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। इसलिए ये अंतरराष्ट्रीय बैठकें और फैसले वैश्विक साम्राज्यवादी ताकतों की इच्छा के सामने कोई महत्व नहीं रखते।

यह सही नहीं है कि इराक इन अन्यायपूर्ण प्रतिबंधों का जवाब दे

हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन सय्यद सदरुद्दीन क़बांची ने अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करते हुए ईरानी एयरलाइंस पर अमेरिका के प्रतिबंधों का उल्लेख किया और कहा कि यहां हम उस पहलू पर बात कर रहे हैं, जिसका संबंध इराक से है।

उन्होंने कहा कि इराक के लिए इन अन्यायपूर्ण प्रतिबंधों का जवाब देना सही नहीं है और यह उचित नहीं है कि इस संघर्ष में कोई पक्ष हम पर ऐसा रुख थोपे, जिसमें हमारे लोगों की सेवा, हमारे हितों और हमारी पहचान का ध्यान न रखा जाए। इराक की ओर से इन प्रतिबंधों का जवाब देना हमारे इराकी हित में नहीं है। इसलिए हम सरकार से इन प्रतिबंधों की समीक्षा करने का अनुरोध करते हैं।

धार्मिक ख़ुत्बा

नजफ़-ए-अशरफ़ के इमामे जुमा ने धार्मिक ख़ुत्बे में तक़वा की नसीहत के बाद कहा कि आज हमारी बातचीत का विषय इस्लाम में गरीबी की समस्या की समीक्षा है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, 82 करोड़ 40 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे हैं। इसका अर्थ है कि दुनिया की 10 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। उदाहरण के लिए, इराक में 5 प्रतिशत, ईरान में 2.5 प्रतिशत, सूडान में 10 प्रतिशत, अमेरिका में 1 प्रतिशत और ब्रिटेन में 4 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। इसलिए गरीबी एक वैश्विक समस्या है। सवाल यह है कि इस्लाम गरीबी की समस्या का समाधान किस तरह करता है?

उन्होंने कहा कि इस्लाम गरीबी की समस्या का दो तरीकों से समाधान करता है। पहला सामाजिक गारंटी की व्यवस्था और दूसरा सामाजिक एकजुटता की व्यवस्था। सामाजिक गारंटी का अर्थ यह है कि लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने की जिम्मेदारी सरकार पर हो। यानी शासक, अमीर और सरकार सभी लोगों की जीवन-व्यवस्था की जिम्मेदारी लें और बैतुलमाल से उनके खर्च को पूरा करें। दूसरा तरीका सामाजिक एकजुटता की व्यवस्था है, जिसमें ज़कात, सदक़ा और ख़ुम्स के माध्यम से स्वयं लोगों की जिम्मेदारी शामिल होती है। सभी लोग दूसरों की जीवन-व्यवस्था में सहायता करने के लिए जिम्मेदार हैं।

हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन सय्यद सदरुद्दीन क़बांची ने आगे कहा कि यहां सदक़े की फ़ज़ीलत और उसके सवाब पर जोर दिया जाता है। इस संबंध में हम रसूल-ए-ख़ुदा (स.) की एक हदीस पढ़ते हैं, जिसमें उन्होंने फ़रमाया:

“सात प्रकार के लोग ऐसे हैं, जिन्हें अल्लाह उस दिन अपनी छाया में स्थान देगा, जिस दिन उसकी छाया के अलावा कोई छाया नहीं होगी: न्यायप्रिय शासक, वह युवा जो अपने पालनहार की इबादत में बड़ा हुआ, वह व्यक्ति जिसका दिल मस्जिद से जुड़ा हुआ है, वे दो व्यक्ति जो अल्लाह की मोहब्बत में एक-दूसरे से जुड़े और उसी पर एक-दूसरे से अलग हुए, वह व्यक्ति जिसे किसी सुंदर स्त्री ने अपनी ओर आकर्षित किया लेकिन उसने कहा कि मैं अल्लाह से डरता हूं, वह व्यक्ति जो सदक़ा देता है और उसे छिपाकर रखता है, यहां तक कि उसके बाएं हाथ को भी पता नहीं चलता कि उसके दाएं हाथ ने क्या खर्च किया, और वह व्यक्ति जो अकेले में अल्लाह को याद करता है और उसकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं।”

उन्होंने इमाम अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.) की हदीस का हवाले देते हुए कहा : “हो सकता है कि हिजाज़ या यमामा में कोई ऐसा व्यक्ति हो, जिसे एक निवाला रोटी मिलने की भी उम्मीद न हो और जिसने कभी पेट भरकर खाने का अनुभव न किया हो। क्या यह संभव है कि मैं पेट भरकर सोऊं, जबकि मेरे आसपास ऐसे लोग हों जिनके पेट भूख से पीठ से चिपके हुए हों और जिनके जिगर भूख और प्यास से जल रहे हों? क्या मैं अपने आप से यह कहकर संतुष्ट हो जाऊं कि मुझे ‘अमीरुल मोमिनीन’ कहा जाता है, जबकि मैं समय की कठिनाइयों में उनके साथ शामिल न रहूं? या जीवन की कठिनाइयों में उनके लिए एक आदर्श न बनूं?”

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