उलेमा ए दीन लोंगो की रहनुमाई करके अंबिया इकराम की रिसालत के वारिस बनते हैं

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उलेमा ए दीन लोंगो की रहनुमाई करके अंबिया इकराम की रिसालत के वारिस बनते हैं

आयतुल्लाह सैयद काज़िम नूर मुफ़ीदी ने समाज का मार्गदर्शन करने और इस्लामी मूल्यों को बढ़ावा देने में धार्मिक विद्वानों की केंद्रीय भूमिका पर ज़ोर देते हुए कहा कि धर्मगुरु लोगों का मार्गदर्शन करके पैग़म्बरों की विरासत के उत्तराधिकारी बनते हैं।

 आयतुल्लाह सैयद काज़िम नूर मुफ़ीदी, ने हाजी अब्दुल करीम आख़ुंद जावर की याद में आयोजित श्रद्धांजलि समारोह को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने उनके निधन पर प्रांत के लोगों, विशेष रूप से गोनबद-ए-क़ाबूस के निवासियों और दिवंगत धर्मगुरु के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जनता की सेवा करने वाले धर्मगुरुओं का बिछड़ना इस्लामी समाज के लिए बहुत बड़ा दुख है।

उन्होंने इस्लामी शिक्षाओं में विद्वानों के स्थान का उल्लेख करते हुए कहा कि पवित्र हदीस «العُلَماءُ وَرَثَةُ الأنبیاء» यानी “विद्वान पैग़म्बरों के उत्तराधिकारी हैं के अनुसार, धर्मगुरु तभी वास्तव में पैग़म्बरों के उत्तराधिकारी कहलाते हैं, जब वे लोगों का मार्गदर्शन करें, उनके दुख-दर्द और समस्याओं को अपना समझें तथा उनके आध्यात्मिक विकास और कल्याण के लिए प्रयास करें।

आयतुल्लाह नूर मुफ़ीदी ने सूरह तौबा की आयत 128 का हवाला देते हुए पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) के नैतिक गुणों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पैग़म्बर लोगों के बीच से उठे, उनकी कठिनाइयों से दुखी होते थे और उन्हें सही रास्ता दिखाने के लिए सदैव प्रयासरत रहते थे। मोमिनों के प्रति उनके हृदय में अत्यंत करुणा और दया थी।

उन्होंने आगे कहा कि इतिहास में यही गुण धार्मिक विद्वानों के लिए आदर्श रहे हैं। उनकी ज़िम्मेदारी केवल स्वयं को सुधारने और व्यक्तिगत धार्मिक कर्तव्यों को पूरा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें दूसरों के मार्गदर्शन की भी ज़िम्मेदारी महसूस करनी चाहिए और लोगों को सत्य तथा कल्याण के रास्ते पर आगे बढ़ने में सहायता करनी चाहिए।

आयतुल्लाह नूर मुफ़ीदी ने सामाजिक जीवन में ज्ञान और आध्यात्मिकता के प्रभाव पर ज़ोर देते हुए कहा कि एक धर्मगुरु को अपने ज्ञान और विश्वास को समाज की सेवा में लगाना चाहिए। उसे लोगों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने और उन्हें ईश्वरीय मूल्यों की ओर मार्गदर्शन देने के लिए प्रयास करना चाहिए।

आयतुल्लाह नूर मुफ़ीदी ने इस्लामी रिवायतों में ज्ञान और विद्वानों की श्रेष्ठता का उल्लेख करते हुए व्यक्तिगत इबादत और सामाजिक ज़िम्मेदारी के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि एक इबादत करने वाला व्यक्ति अपनी मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयास करता है, जबकि धार्मिक विद्वान स्वयं को सुधारने के साथ-साथ दूसरों के मार्गदर्शन और उनकी मुक्ति के बारे में भी सोचता है।

उन्होंने कहा कि ज्ञान और विद्वान को विशेष स्थान इसलिए प्राप्त होता है, क्योंकि वह अपने ज्ञान और आध्यात्मिकता का उपयोग लोगों की सेवा के लिए करता है तथा ईश्वर और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाता है।

समारोह के दूसरे हिस्से में आयतुल्लाह नूर मुफ़ीदी ने दिवंगत हाजी अब्दुल करीम आख़ुंद जावर और उनके पिता के साथ अपने पुराने परिचय और संबंधों को याद किया। उन्होंने दिवंगत धर्मगुरु की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनकी स्मृतियों में उनकी आंतरिक पवित्रता, चरित्र की शुद्धता, विशाल हृदय और मुसलमानों के बीच एकता के प्रति सकारात्मक एवं गहरी सोच आज भी मौजूद है।

उन्होंने कहा कि दिवंगत आख़ुंद जावर इस्लामी क्रांति के आदर्शों और मुस्लिम उम्मत की एकता की आवश्यकता में विश्वास रखते थे। आयतुल्लाह नूर मुफ़ीदी ने कहा कि उन्हें दिवंगत धर्मगुरु और उनके पिता के प्रति हमेशा सम्मान और लगाव रहा है। धर्म तथा मुसलमानों के बीच आपसी सद्भाव के लिए काम करने वाले ऐसे व्यक्तित्वों का बिछड़ना पूरे इस्लामी समाज के लिए दुखद है।

अंत में, वली-ए-फ़क़ीह के प्रतिनिधि ने आशा व्यक्त की कि इस्लामी समाज को हमेशा ऐसे विद्वानों की सेवाएँ प्राप्त होती रहेंगी, जो लोगों का मार्गदर्शन करने, आपसी सद्भाव बढ़ाने और मुसलमानों के बीच एकता को मज़बूत करने के साथ-साथ धार्मिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करते रहेंगे।

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