मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश करने वाले, देश के दुश्मन हैं

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मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश करने वाले, देश के दुश्मन हैं

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने कहा है कि जो लोग मुसलमानों को उनके ही देश में अजनबी और दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना चाहते हैं, वे वास्तव में देश के दुश्मन हैं। मुसलमान इस देश में किसी की दया पर नहीं रह रहे हैं, बल्कि देश की आज़ादी में उनके पूर्वजों ने महान कुर्बानियां दी हैं।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने कहा कि जो लोग मुसलमानों को उनके ही देश में अजनबी और दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना चाहते हैं, वे वास्तव में देश के दुश्मन हैं। मुसलमान इस देश में किसी की दया पर नहीं रह रहे हैं, बल्कि देश की आज़ादी में उनके पूर्वजों ने महान कुर्बानियां दी हैं। उन्होंने सवाल किया कि क्या भारत में मुसलमान होना अपराध बना दिया गया है? उन्होंने स्पष्ट किया कि मुसलमानों को उनके ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोई भी कोशिश सफल नहीं हो सकती।

उन्होंने 30 और 31 अक्टूबर को हरियाणा के नूंह जिले के मेवात में आयोजित जमीयत उलेमा-ए-हिंद की मजलिस-ए-मुन्तज़िमा के दो दिवसीय अधिवेशन को संबोधित किया। अधिवेशन में देश की मौजूदा स्थिति, मुसलमानों के सामने मौजूद समस्याओं, वक्फ संपत्तियों, समान नागरिक संहिता, इस्लामी जगत और फिलिस्तीन सहित विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श के बाद कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव और एक विस्तृत घोषणापत्र पारित किया गया।

मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश करने वाले, देश के दुश्मन हैं: मौलाना महमूद असद मदनी

देश संवैधानिक और वैचारिक संकट से गुजर रहा है

मौलाना महमूद असद मदनी ने कहा कि देश इस समय ऐसे नाजुक दौर से गुजर रहा है, जहां लोकतंत्र की मूल भावना और संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करने की कोशिशें की जा रही हैं। धार्मिक नफरत और भेदभाव का माहौल केवल मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों को ही प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि दलितों, वंचित वर्गों और कानून के शासन की व्यवस्था पर भी इसका असर पड़ रहा है।

उन्होंने पिछले एक वर्ष के दौरान नफरत भरे भाषणों की 1,600 से अधिक प्रमाणित घटनाओं और उनमें से 87 प्रतिशत मामलों में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज न होने के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि यह स्थिति न्याय की उपलब्धता और कानून लागू करने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

बुलडोजर कार्रवाई की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि प्रशासन स्वयं ही न्यायाधीश और स्वयं ही सजा देने वाला बनता जा रहा है। किसी नागरिक के घर या संपत्ति को कानूनी प्रक्रिया पूरी किए बिना ध्वस्त करना संविधान, कानून के शासन और न्यायपालिका की गरिमा पर हमला है।

मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश करने वाले, देश के दुश्मन हैं: मौलाना महमूद असद मदनी

उन्होंने बहुसंख्यक समुदाय को खतरे में बताने वाले विमर्श को भी खारिज करते हुए कहा कि यह बहुसंख्यकों के खतरे का मामला नहीं, बल्कि कुर्सी और सत्ता की लालसा का परिणाम है। जब सरकार रोजगार, किसानों और अर्थव्यवस्था जैसी वास्तविक समस्याओं को हल करने में नाकाम रहती है, तो जनता का ध्यान भटकाने के लिए घुसपैठ और जनसंख्या से जुड़े भय फैलाने वाले विमर्श सामने लाए जाते हैं। उन्होंने संसद में गृह मंत्रालय के जवाब का हवाला देते हुए कहा कि सरकार के पास अवैध घुसपैठ से संबंधित कोई प्रमाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को सक्रिय संघर्ष का संदेश देते हुए उन्होंने कहा, “रोना-धोना और शिकायतें करना बंद करें! मैदान में उतरकर डटकर खड़े हो जाएं!” उन्होंने कहा कि इस्लाम की रक्षा केवल नारों और दावों से नहीं, बल्कि अपने जीवन को धर्म के अनुरूप ढालने से संभव है। मतभेद को विरोध समझने के बजाय दूसरों की बात सुनने और सही राय स्वीकार करने का साहस पैदा करना चाहिए।

मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश करने वाले, देश के दुश्मन हैं: मौलाना महमूद असद मदनी

मजलिस-ए-मुन्तज़िमा के महत्वपूर्ण प्रस्ताव और फैसले

मजलिस-ए-मुन्तज़िमा ने मुसलमानों के खिलाफ नफरत भरे भाषणों, इस्लामोफोबिया, भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या और सामाजिक व आर्थिक बहिष्कार के अभियानों पर चिंता व्यक्त की। साथ ही मांग की कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तहसीन पूनावाला मामले में दिए गए निर्देशों को लागू किया जाए, प्रत्येक जिले में पुलिस अधीक्षक स्तर के नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएं और नफरत पर आधारित अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित की जाएं।

जनसंख्या के अध्ययन के लिए गृह मंत्रालय की उच्चस्तरीय समिति के गठन और उसके आधारभूत अनुमानों पर भी आपत्ति जताई गई। जमीयत ने मांग की कि इस उद्देश्य के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के विशेषज्ञों पर आधारित एक निष्पक्ष आयोग गठित किया जाए।

वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा से संबंधित प्रस्ताव में वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 को अपने मौजूदा स्वरूप में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों तथा वक्फ की मूल भावना के विरुद्ध बताते हुए इसमें संशोधन की मांग की गई। अधिवेशन में वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा और बेहतर प्रबंधन के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) की तर्ज पर एक स्वतंत्र और सशक्त संस्था स्थापित करने का प्रस्ताव भी पेश किया गया।

मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश करने वाले, देश के दुश्मन हैं: मौलाना महमूद असद मदनी

मस्जिदों, ईदगाहों और अन्य इस्लामी स्थलों की सुरक्षा के संबंध में अधिवेशन ने मांग की कि 1991 के पूजा स्थल अधिनियम (प्लेसेज़ ऑफ वर्शिप एक्ट) को पूरी तरह लागू किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के 12 दिसंबर 2024 के अंतरिम आदेश का पालन करने और कानूनी प्रक्रिया के बिना मस्जिदों को ध्वस्त करने पर रोक लगाने पर भी जोर दिया गया। यह फैसला किया गया कि जमीयत की सभी प्रांतीय, जिला और तहसील इकाइयां केंद्रीय जमीयत उलेमा-ए-हिंद द्वारा निर्धारित एक ही तारीख और समय पर संबंधित अधिकारियों को ज्ञापन सौंपेंगी। मस्जिदों की भूमि और अन्य कानूनी दस्तावेजों की जांच तथा उन्हें पूरा करने के लिए छह महीने की समय-सीमा भी तय की गई।

मदरसे से संबंधित प्रस्ताव में मान्यता और जांच के नाम पर मदरसों को परेशान करने तथा उनके खिलाफ निराधार दुष्प्रचार बंद करने की मांग की गई। मदरसों के जिम्मेदारों को यह भी निर्देश दिया गया कि वे भूमि के दस्तावेज, स्वीकृत नक्शे, विद्यार्थियों की पहचान संबंधी विवरण और वित्तीय हिसाब-किताब पूरी तरह सुरक्षित रखें।

समान नागरिक संहिता को खारिज करते हुए इसे भेदभावपूर्ण बताया गया।

फिलिस्तीन और राष्ट्रीय एकता पर जोर

अधिवेशन में इस्लामी जगत के विभिन्न देशों में जारी युद्ध की स्थिति और फिलिस्तीन के मुद्दे पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। एक स्वतंत्र और संप्रभु फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना, इजरायली बस्तियों के विस्तार पर रोक, युद्ध अपराधों के जिम्मेदार लोगों को सजा देने, मस्जिद-ए-अक्सा और अन्य पवित्र स्थलों की सुरक्षा तथा गाज़ा सहित फिलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवीय सहायता बिना किसी रुकावट के पहुंचाने की मांग की गई।

व्यापक घोषणापत्र में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने राष्ट्रीय एकता और आपसी सम्मान के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि धर्म के नाम पर देश को बांटना न पहले स्वीकार्य था, न आज है और न भविष्य में होगा। घोषणापत्र में किसानों, विद्यार्थियों, दलितों और अन्य अल्पसंख्यकों सहित सभी पीड़ित और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए आवाज उठाने का संकल्प भी व्यक्त किया गया। नई पीढ़ी को निराशा और भय के बजाय साहस, हिम्मत और दृढ़ता के साथ सत्य और न्याय के लिए खड़े होने की प्रेरणा दी गई।

मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश करने वाले, देश के दुश्मन हैं: मौलाना महमूद असद मदनी

युवाओं के प्रशिक्षण और संगठन को मजबूत बनाने पर जोर

अधिवेशन में दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मौलाना अबुल कासिम नोमानी ने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद के कार्यक्षेत्र का विस्तार हुआ है, इसलिए युवाओं की क्षमताओं का भरपूर उपयोग करने की आवश्यकता है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के उपाध्यक्ष मौलाना मुहम्मद सलमान बिजनौरी ने धार्मिक संघर्ष के लिए शैक्षणिक क्षमता के साथ आध्यात्मिक प्रशिक्षण, निष्ठा और दृढ़ता को आवश्यक बताया। नायब अमीर-ए-हिंद मौलाना मुहम्मद सलमान मंसूरपुरी ने संगठन को मजबूत बनाने के लिए युवाओं और प्रतिभाशाली लोगों को आगे लाने तथा उन्हें जिम्मेदारियां सौंपने पर जोर दिया।

अधिवेशन में नई पीढ़ी के धार्मिक और नैतिक प्रशिक्षण, ईमान और आस्था की रक्षा तथा इस्लामी पहचान को मजबूत बनाने को महत्वपूर्ण आवश्यकता बताया गया। साथ ही जमीयत उलेमा-ए-हिंद की केंद्रीय, प्रांतीय, जिला, शहरी और स्थानीय इकाइयों को वार्षिक कार्ययोजना तैयार करके उस पर नियमित रूप से अमल करने का निर्देश दिया गया।

अधिवेशन में सवाल-जवाब के सत्र भी आयोजित किए गए, जिनमें जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों ने सदस्यों के सवालों के जवाब दिए। इस अवसर पर संगठन के पूर्व प्रमुख नेता मौलाना मुहम्मद इब्राहिम अलवरी (रह.) की जीवनी, विद्यार्थियों के लिए “सीरतुन्नबी (स.) : 150 सवाल-जवाब” और मुफ्ती अशफाक काज़ी की कई पुस्तकों का विमोचन भी किया गया।

अधिवेशन में दारुल उलूम देवबंद और मज़ाहिर उलूम सहारनपुर के विद्वानों, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के केंद्रीय और प्रांतीय पदाधिकारियों तथा देशभर से आए मजलिस-ए-मुन्तज़िमा के सदस्यों ने भाग लिया।

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