हज़रत फ़ातिमा बिन्ते असद धीरे- धीरे काबे की ओर क़दम बढ़ा रही थीं। वह नौ महीने की प्रतीक्षा के बाद अपने बच्चे के जन्म के क्षण गिन रही थीं और उस कठिन घड़ी में उन्होंने केवल ख़ुदा की शरण ली थी और उसी से मदद मांग रही थीं।
वह काबे के सामने खड़ी हो गयी थीं। उनका दिल महान ख़ुदा के प्रेम में डूबा था। उन्होंने महान ख़ुदा से इस प्रकार दुआ की: ऐ ब्रह्मांड की रचना करने वाले, ऐ पहाड़ों को पैदा करने वाले, ऐ समुद्रों को पैदा करने वाले, ऐ जंगलों को पैदा करने वाले! मैं तेरी इबादत करती हूं। तेरे पैग़म्बरों के धर्मों को भी मानती हूं। हज़रत इब्राहीम की बातों पर ईमान रखती हूं। मेरे पालने वाले तुझे इस पवित्र घर का वास्ता और तेरी बारगाह के समस्त निकटवर्ती हस्तियों का तुझे वास्ता देती हूं कि जो बच्चा मेरे पेट में है इस के जन्म को आसान कर दे।
हज़रत फ़ातिमा बिन्ते असद काबे को निहार रही थीं। एकाएक काबे की दीवार फटी और वहां पर जो लोग मौजूद थे जिन में अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब, यज़ीद इब्ने तअफ़ जैसे बहुत से लोगों ने इस दृश्य को अपनी आंखों से देखा और हज़रत फ़ातिमा बिन्ते असद काबे के अंदर चली गयीं और काबे की जो दीवार फटी थी दोबारा जुड़ गयी। जो लोग वहां पर थे यह दृश्य देखकर हैरान रह गये। उन लोगों ने काबे की दीवार पर हाथ मारा और उसके दरवाज़े को खोलने का बहुत प्रयास किया मगर वह टस से मस न हुई। इसके बाद उन लोगों की समझ में आ गया कि यह महान अल्लाह की आयतों व निशानियों में से है।
हज़रत फ़ातिमा बिन्ते असद तीन दिनों तक काबे के अंदर रहने के बाद चौथे दिन बाहर निकलीं। जब वह बाहर निकलीं तो एक नन्हा बच्चा उनकी गोद में था। उन्होंने कहा कि मैंने काबे के अंदर जन्नत के फलों को खाया। जब मेरा बच्चा पैदा हो गया और मैं बाहर आना चाहती थी तो एक आवाज़ आई कि: ऐ फ़ातिमा! अपने बच्चे का नाम अली रख दो। इसके बाद उन्होंने ख़ानए काबा के पास मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि: ऐ लोगों! जान लो कि इस बच्चे का जन्म काबे में हुआ है। इस प्रकार 13 रजब (30 आमुलफ़ील) को महान हस्ती हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने काबा में आंखे खोली।
पैग़म्बरे इस्लाम (स) की मशहूर हदीस है कि अगर तमाम इंसान और जिन्नात लिखने वाले बन जायें, तमाम पेड़ कलम बन जायें और तमाम समंदर सियाही बन जायें तब भी अली के फ़ज़ाएल व विशेषताएं नहीं लिख सकते।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम की फ़ज़ीलतों को बयान करना सूरज को चिराग़ दिखाने के समान है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स) की एक अन्य हदीस है जिस में आप फ़रमाते हैं कि: मेरे और अली के अलावा किसी ने अल्लाह को नहीं पहचाना और मेरे और अल्लाह के सिवा अली को किसी ने नहीं पहचाना है। अली उस महान हस्ती का नाम है जिसकी मोहब्बत वह अच्छाई है जो बुराइयों और गुनाहों को खा जाती है। अली उस महान हस्ती का नाम है जिनके सच्चे अनुयाई और उनके पद चिन्हों पर अमल करने वाले का स्थान स्वर्ग है।
इसी प्रकार अली उस महान हस्ती का नाम है जिनसे दुश्मनी रखने वाले का ठिकाना नरक है। अली उस महान हस्ती का नाम है जिस ने अपने दुश्मन पर भी अन्याय नहीं किया और हज़रत अली अलैहिस्सलाम बार बार कहते थे कि अपने दुश्मन के साथ भी इंसाफ़ करो। हज़रत अली उस महान योद्धा का नाम है जिस ने कभी भी दुश्मन को पीठ नहीं दिखाई, हज़रत अली अलैहिस्सलाम रणक्षेत्र से भागने वाले दुश्मन का कभी भी पीछा नहीं करते थे। अगर दुश्मन भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम से कोई सवाल पूछता था तो वे उसके सवाल का जवाब देते थे। उन का सबसे मशहूर दुश्मन मुआविया बिन अबू सुफ़ियान मलऊन ने बारमबार हज़रत अली अलैहिस्सलाम से सवाल पूछा और उन्हों ने उसका जवाब दिया।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम वह महान दानी थे जिन्होंने नमाज़ की हालत में सदक़ा (दान) दिया। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ख़ुदाई निष्ठा की वह प्रतिमूर्ति थे जिन के दान व निष्ठा की प्रशंसा ख़ुदावंदे करीम पवित्र क़ुरआन में कर रहा है। पवित्र क़ुरआन हज़रत अली अलैहिस्सलाम की निष्ठा की प्रशंसा करते हुए कहता है कि हम तो केवल ख़ुदा के प्रेम में खिलाते हैं और हमें न इसका बदला चाहिये न शुक्रिया।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम वह महान हस्ती हैं जिनके बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने फ़रमाया हैं कि: अली के चेहरे को देखना इबादत है, अली से मोहब्बत मोमिन की अलामत है और उन से दुश्मनी और द्वेष कुफ़्र और मुनाफ़िक़ की अलामत है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम वह महान हस्ती हैं जिन्हें यतीमों व अनाथों का पिता कहा जाता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम वह महान हस्ती थे जो ख़ुदाई ज्ञान की प्रतिमूर्ति थे और बारमबार कहते थे कि जो कुछ पूछना हो मुझ से पूछ लो इससे पहले की मैं तुम लोगों के बीच से चला जाऊं।
पूरा इतिहास गवाह है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अलावा किसी ने भी यह दावा नहीं किया कि जो कुछ पूछना हो पूछ लो और जिस ने भी यह दावा किया वह ज़लील व अपमानित हुआ। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की बहादुरी का आलम यह था कि दुश्मन इस बात पर गर्व करते थे कि मैं अली के मुक़ाबले में गया था।
वैसे तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम का पूरा जीवन दूसरों की भलाई व परोपकार का स्रोत व केन्द्र था परंतु साढ़े चार साल तक उन्होंने जो इस्लामी हुकूमत (सरकार) चलाई है आज तक उस का उदाहरण नहीं मिलता। महान ख़ुदा के आदेश से पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपने बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। इस्लामी सत्ता की बागड़ोर जब तक हज़रत अली अलैहिस्सलाम के हाथों में थी उन्होंने उन्हीं नीतियों पर अमल किया जो महान ख़ुदा अपने पैग़म्बर (स) से चाहता था।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने शासन काल में मालिके अश्तर को मिस्र का गवर्नर बनाया और उनके नाम लिखे पत्र में सबसे पहले एक अच्छे शासक की विशेषताओं को लिखा। रोचक बात यह है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने इस पत्र में सबसे पहले स्वंय को महान ख़ुदा का बंदा व दास लिखा और उसके बाद पत्र को इस प्रकार लिखते हैं: "यह बातें अल्लाह के बंदे अली की ओर से मालिके अश्तर के नाम। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने जिन शब्दों में मालिके अश्तर को संबोधित किया है वे इस बात के सूचक हैं कि शासक को सबसे पहले स्वंय को ख़ुदा का बंदा समझना चाहिये। जो इंसान स्वंय को महान व सर्वसमर्थ ख़ुदा का बंदा समझेगा वह कभी भी मग़रूर (उद्दंडी) नहीं बनेगा। वह हमेशा अपनी सीमा में रहेगा। स्वंय को बंदा समझने वाला कभी भी दूसरे को गिरी हुई नज़र से नहीं देखेगा। यही नहीं जो शासक स्वंय को ख़ुदा का बंदा समझेगा वह दूसरों पर अत्याचार नहीं करेगा और स्वंय को दूसरों से श्रेष्ठ नहीं समझेगा। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने पत्र में स्वंय को महान ख़ुदा का बंदा लिखकर बता दिया कि शासक को जनता का सेवक समझना चाहिये। जो इंसान शासक हो उसे यह सोचना चाहिये कि महान ख़ुदा ने उसे लोगों की सेवा का सौभाग्य प्रदान किया है। उसे अपने पद का दुरुपयोग नहीं करना चाहिये।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने सदाचरण से यह सिद्ध कर दिया कि वह स्वंय को ख़ुदा का बंदा समझते थे। जो लोग स्वंय को ख़ुदा का बंदा समझते हैं जब सत्ता की बागडोर उनके हाथ में होती है तो वे दूसरों के साथ वही बर्ताव करते हैं जो एक इंसान को दूसरे इंसान के साथ करना चाहिये। हज़रत अली अलैहिस्सलाम हमेशा अल्लाह को नज़र में रखते थे और उनका मानना था कि हर शक्ति से बड़ी अल्लाह की शक्ति है, अगर किसी भी चीज़ में कुछ शक्ति है तो उसका स्रोत ख़ुदा है।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने मालिके अश्तर को जो पत्र लिखा है उसमें वह ख़ुदा की बंदगी को लोगों की सेवा में देखते हैं इसीलिए वह मालिके अश्तर से लोगों से प्रेम करने और उनके साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करने की सिफ़ारिश करते हैं। इसी प्रकार हज़रत अली अलैहिस्सलाम मालिके अश्तर से सिफ़ारिश करते हैं कि लोगों के साथ रक्तपिपासु की भांति व्यवहार न करना और उनके माल को खाने को ग़नीमत मत समझना। उसके बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम लोगों से प्रेम के कारण को इस प्रकार बयान करते हैं। क्या तुम जानते हो कि लोग दो प्रकार के हैं? लोग या तुम्हारे धार्मिक भाई हैं या सृष्टि व रचना में तुम्हारे जैसे हैं और जैसे ज़िन्दगी में तुम से ग़लती होती है वैसे उन से भी होती है तो तुम उन्हें उसी नज़र से देखो जैसे तुम चाहते हो कि ख़ुदा तुम्हें देखे।
पूरी दुनिया हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ज्ञान और दूसरे समस्त सदगुणों की क़सीदा पढ़ रही है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम वह महान हस्ती हैं जिस के अंदर मानवता के समस्त सदगुण अपने शिखर पर हैं यानी वह सर्वश्रेष्ठ इंसान के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। समस्त अच्छाईयों के उदाहरण का नाम अली है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ज्ञान के चिराग़ हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ज्ञान की विशेषता यह है कि उन्हें इंसानों के पैदा होने और उनके मरने के बाद तक का ज्ञान है। उन्हें आसमानों, आसमानों के उपर, ज़मीन और ज़मीन के नीचे का पूरा- पूरा ज्ञान है। उन्हें इंसानों की कल्पना से परे चीज़ों का भी ज्ञान है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) की मशहूर हदीस है कि मैं ज्ञान का शहर हूं और अली उसका दरवाज़ा हैं जो शहर में दाखिल होना चाहता है उसे दरवाज़े से आना चाहिये।
एक बार किसी ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम से पूछा कि माल बेहतर है या इल्म व ज्ञान? तो आपने इसके जवाब में फ़रमाया कि: ज्ञान पैग़म्बरों की विरासत है और माल क़ारून, फ़िरऔन, हामान और शद्दाद की विरासत है। इसी प्रकार हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि ज्ञान तुम्हारी रक्षा करता है जबकि तुम माल की रक्षा करते हो। विद्वान के दोस्त अधिक होते हैं जबकि मालदार के दुश्मन बहुत होते हैं, माल खर्च करने पर घटता है जबकि इल्म खर्च
करने पर बढ़ता है, धनाढ्य व मालदार व्यक्ति को कंजूस कहा जाता है जबकि ज्ञानी का
सम्मान किया जाता है और उसे सम्मान के साथ याद किया जाता है, धन को चुराया जा सकता है परंतु ज्ञान की चोरी नहीं की जा सकती, धन समय बीतने के साथ- साथ पुराना हो जाता है और ज्ञान जितना भी समय गुज़र जाये कभी भी पुराना नहीं होता है, माल मरने तक ही इंसान के साथ रह सकता है परंतु ज्ञान ज़िन्दगी के अलावा मरने के बाद भी उसके साथ रहता है, ज्ञान है जो तन्हाई में इंसान का साथी है और उसे मुश्किलों से मुक्ति प्रदान करता है और उसकी भलाई व कामयाबी का कारण बनता है, माल इंसान के दिल को सख़्त व कठोर बनाता है जबकि ज्ञान इंसान के दिल को प्रकाशमयी बनाता है, अज्ञानी व नादान इंसान छोटा होता है चाहे वह बूढ़ा ही क्यों न हो जबकि ज्ञानी बड़ा होता है चाहे वह उम्र में छोटा ही क्यों न हो।
बहरहाल हज़रत अली अलैहिस्सलाम ज्ञान और न्याय सहित समस्त सदगुणों की प्रतिमूर्ति थे।
? *अल्लाह हुम्मा अज्जिल ले वलियेकल फ़रज...*













