प्रस्तावना:
इस्लाम के इतिहास की पारंपरिक और आम धारणाओं में हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की 201 हिजरी में मदीना से ईरान की यात्रा को अक्सर भाई से मिलने की बहन की इच्छा और भावनात्मक कदम तक सीमित कर दिया जाता है। लेकिन शिया इतिहास को राजनीतिक और विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखा जाए तो यह सीमित दृष्टिकोण इस प्रवास के व्यापक, रणनीतिक और सक्रिय पहलुओं को नज़रअंदाज़ कर देता है।
अब्बासी शासक मामून द्वारा इमाम रज़ा (अ) को जबरन मर्व ले जाए जाने के बाद हिजाज़ में इमामत के संपर्क का एक बड़ा संकट पैदा हो गया और विचारधारा के स्तर पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया। ऐसे तनावपूर्ण माहौल में हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) की यह यात्रा केवल पारिवारिक यात्रा नहीं थी, बल्कि आठवें इमाम के सांस्कृतिक संपर्क को सीमित करने की कोशिश को तोड़ने के लिए एक सचेत धार्मिक-राजनीतिक प्रवास था। उन्होंने इमामिया मसलक की एक सक्रिय प्रतिनिधि और कार्यकर्ता के रूप में भूमिका निभाई, ताकि अब्बासियों के जटिल प्रभुत्व के सामने अपने भाई की शैक्षिक और राजनीतिक नेतृत्व की स्थिति को मजबूत किया जा सके।[1]
1- प्रवास से पहले क़ुम का सांस्कृतिक माहौल; अशांति और बिखराव का दौर
इस प्रवास की महत्ता और उसके प्रभाव को समझने के लिए 180 से 230 हिजरी के बीच क़ुम के ज्ञान और सांस्कृतिक माहौल को समझना आवश्यक है। उस समय क़ुम एक अशांत और विभिन्न विचारधाराओं के संघर्ष का केंद्र था।
अब्बासी शासक मामून ने अपने पूर्ववर्ती शासकों के विपरीत एक ऐसी नीति अपनाई थी जो ऊपर से नरम, लेकिन भीतर से बहुत खतरनाक थी। वह मुतज़िला के कलाम और विचारधारा को बढ़ावा देने तथा इमाम रज़ा (अ) को अपना उत्तराधिकारी बनाने के माध्यम से शिया इमामों के ईश्वरीय रूप से निर्धारित नेतृत्व के स्थान को केवल एक सामान्य आध्यात्मिक और गैर-राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित करने की कोशिश कर रहा था।
इस नीति के कारण क़ुम और जबाल के क्षेत्र में वाक़िफ़िया, ग़ुलात, ज़ैदिया और इस्माइलिया जैसे विभिन्न संप्रदायों का प्रभाव बढ़ गया था।[2] इसी दौरान शऊबिया जैसे आंदोलनों के उभरने से भी स्थिति और अधिक जटिल हो गई थी। इन आंदोलनों में अरब-विरोधी विचारों के कारण इस्लामी एकता और व्यवस्था को भी चुनौती मिल रही थी।
इस दौर में इमामिया शिया समुदाय विभाजन और अपनी मूल पहचान खोने के खतरे के कगार पर था। इस सांस्कृतिक अराजकता से बाहर निकलने के लिए उसे एक वैचारिक झटके और एक मजबूत पहचान-केन्द्र की आवश्यकता थी।
2- प्रतिबंधित मार्ग पर जागरूकता का कारवां; सावेह से अशअरियों के क़िले तक
इस पहचान के संकट का उत्तर हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) के प्रवास के साथ सामने आया। उनके कारवां के मार्ग और उसमें शामिल लोगों पर ध्यान देने से इसके राजनीतिक और प्रभावशाली स्वरूप का पता चलता है।
ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार, मामून ने स्पष्ट आदेश दिया था कि इमाम रज़ा (अ) को कूफ़ा और क़ुम के रास्ते से न ले जाया जाए, ताकि शिया केंद्रों के साथ उनके संपर्क का मार्ग बंद किया जा सके।[3] इसके बावजूद मूसा बिन जाफ़र (अ) की बेटी हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) ने लगभग 400 हाशमी लोगों के कारवां के साथ जानबूझकर और पूरी जानकारी के साथ उसी प्रतिबंधित मार्ग को चुना।
कारवां में इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी इस बात का संकेत थी कि यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और प्रचारात्मक अभियान था। सावेह में इस कारवां पर सैन्य हमला, उनके साथियों की शहादत और हज़रत की गंभीर बीमारी इस बात का प्रमाण है कि अब्बासी शासन ने इस यात्रा को सामान्य ज़ायरीनों के कारवां के रूप में नहीं, बल्कि अपने शासन के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखा।[4]
जब इस घटना की खबर क़ुम पहुंची तो वहां के शिया अशअरी लोग, जो उस क्षेत्र में मूल शिया समुदाय के प्रमुख समर्थक थे, सक्रिय हो गए। मूसा बिन ख़ज़राज़ हज़रत के स्वागत के लिए पहुंचे, ताकि क़ुम को शियाओं का एक मजबूत और सुरक्षित केंद्र बनाया जा सके।
बीमारी और कठिनाइयों के बावजूद हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) का 17 दिनों तक “बैतुन्नूर” में ठहरना एक महत्वपूर्ण अवसर बना। इस दौरान क़ुम के प्रमुख लोगों तक इमामिया मसलक की बुनियादी शिक्षाएं पहुंचीं। इनमें विलायत को सिद्ध करने वाली “हदीस-ए-फ़ातिमियात” जैसी महत्वपूर्ण रिवायतें भी शामिल थीं।
3- बिदअतों के सामने मसलक-ए-रज़वी का प्रकट होना
हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) का यह छोटा-सा प्रवास क्षेत्र के सांस्कृतिक स्वरूप को पूरी तरह बदलने वाला साबित हुआ और वाक़िफ़िया विचारधारा को गंभीर झटका लगा।
इमाम रज़ा (अ) की सगी बहन की मौजूदगी और उनके द्वारा अपने भाई की इमामत की पुष्टि ने आम लोगों के बीच वाक़िफ़ियों की वैधता के आधार को काफी कमजोर कर दिया।
दूसरी ओर, इस नए धार्मिक केंद्र के प्रभाव में “ग़ुलात” के खिलाफ भी व्यापक संघर्ष शुरू हुआ। क़ुम के विद्वानों ने इमाम रज़ा (अ) की तर्कसंगत शिक्षाओं से प्रेरणा लेते हुए झूठे दावेदारों को शहर से बाहर कर दिया।
इस शुद्धिकरण का परिणाम वैचारिक स्पष्टता और धार्मिक स्थिरता के रूप में सामने आया। धीरे-धीरे इमामिया शिया विचारधारा को प्रमुखता मिली और “रफ़्ज़” अर्थात अत्याचार और असत्य को अस्वीकार करने की भावना क़ुम के सामूहिक धार्मिक चरित्र का एक मजबूत हिस्सा बन गई।
4- सभ्यता का जन्म और क़ुम के ज्ञान-केंद्र की स्थापना
201 हिजरी के रबीउल आखिर महीने में हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) का सांसारिक जीवन समाप्त हुआ, लेकिन यह यात्रा का अंत नहीं था। बल्कि यह एक महान सभ्यतागत विकास की शुरुआत थी।
बाग़-ए-बाबलान में उनकी दफन से क़ुम अब्बासी अत्याचार से बचकर आने वाले सादात और शियाओं के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।[5]
उनके पवित्र और पाक रौज़े की बरकत से क़ुम में “फ़िक़्ह और हदीस के मदरसे” की शुरुआती नींव ज़करिया बिन आदम और अहमद बिन मुहम्मद बिन ईसा अशअरी जैसे महान विद्वानों ने रखी। इसके बाद हदीस के ज्ञान का प्रमुख केंद्र कूफ़ा से क़ुम की ओर स्थानांतरित होने लगा।[6]
इस नए ज्ञान-केंद्र ने हदीसों की जांच और शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया तथा ग़ुलू और अतिशयोक्ति वाले विचारों को अस्वीकार करने का प्रयास किया।
ज्ञान के इस विकास को दिबल ख़ुज़ाई क़ुम्मी जैसे प्रभावशाली लोगों की मौजूदगी से और मजबूती मिली। दिबल की जोशीली और प्रभावशाली शायरी तथा हज़रत के पवित्र रौज़े से मिलने वाली आध्यात्मिक और धार्मिक प्रेरणा के मेल ने क़ुम के लोगों के दिलों में इमाम रज़ा (अ) की विचारधारा को गहराई से स्थापित किया।
बाद के फ़क़ीहों और विद्वानों के अनुसार, इस प्रवास की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल असाधारण घटनाओं और भौतिक करामात में नहीं थी, बल्कि महान ज्ञान-केंद्रों की स्थापना और दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों तक ज्ञान और तक़वा की रोशनी पहुंचाने में थी।[7]
5- अंतिम बात
दूसरी और तीसरी हिजरी शताब्दी में क़ुम क्षेत्र के इतिहास और संस्कृति के तुलनात्मक अध्ययन से यह बात स्पष्ट होती है कि हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) का प्रवास एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक और रणनीतिक अभियान था। इस अभियान ने इमामत की विचारधारा को समाप्त करने के अब्बासी शासन के प्रयासों को असफल बना दिया।
हज़रत का यह पवित्र आगमन एक ओर क़ुम के सामूहिक धार्मिक वातावरण को वाक़िफ़िया, ग़ुलात और शऊबिया जैसी विभिन्न विचारधाराओं के कारण पैदा हुई अशांति और बिखराव से मुक्त करने का कारण बना, वहीं दूसरी ओर इमामिया शिया समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान-केंद्र की मजबूत नींव रखी। इस प्रकार शिया विचार और फ़िक़्ह की निरंतरता को ग़ैबत-ए-कुबरा और उसके बाद की सदियों तक मजबूती मिली।
क़ुम में हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) का पवित्र रौज़ा केवल एक साधारण ज़ियारतगाह नहीं है, बल्कि उस सभ्यता का केंद्र है जिसके चारों ओर ईरान की धरती पर शिया ज्ञान और विचार की संरचना विकसित हुई।
ईरज हेजाज़ी; धर्म और मीडिया के क्षेत्र के शोधकर्ता एवं लेखक
संदर्भ:
[1] शहीदी पाक, मुहम्मद रज़ा (1384), “औज़ा ए फ़रहंगी क़ुम हंगामे वुरूद फ़ातेमा मासूमा”; तथा: अलवी अलीआबादी, फ़ातेमा-सादात (1397), “मुहाजरत हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स) बे ईरान।”
[2] नज्जाशी, अहमद बिन अली, “रिजालुन्नजाशी”, पेज 354।
[3] इब्ने बाबवैह, मुहम्मद बिन अली (1385), “ओयून अख़बार अर-रज़ा (अ)”।
[4] क़ुम्मी, हसन बिन मुहम्मद (1361), “तारीख़-ए-क़ुम”, अनुवाद: हसन बिन अली अब्दुलमलिक क़ुम्मी, पेज 213।
[5] क़ुम्मी, तारीख़-ए-क़ुम, पेज 213।
[6] क़ज़वीनी राज़ी, नसीरुद्दीन अब्दुलजलील, “अन-नक़्ज़”।
[7] हुसैनी, जवाद (1392), “तारीख व सीरतः हज़रत फ़ातेमा मासूमा (स) दर सुखनाने आलेमान ”, “मुबल्लेग़ान पत्रिका”, अंक 169।













