ज़ंग लगा हुआ अमेरिकी नौसैनिक बेड़ा अब्राहम लिंकन थाईलैंड के तट पर लंगर डाले हुए है।
यह एक पुराने और खोखले बातिल निज़ाम की स्पष्ट निशानी दिखाई दे रहा है।
एक ऐसा जंग लगा हुआ नौसैनिक बेड़ा, जिसके चालक दल के चेहरों की रौनक भी 286 दिनों के नसों को तोड़ देने वाले डर ने पूरी तरह खत्म कर दी है।
एक ऐसा खतरा, जिसमें हर पल यह डर उनके दिमाग को खाए जा रहा था कि कहीं ईरानी सेना की आत्मघाती नावें आकर उनसे न टकरा जाएं और हम बिना मौत के ही खुले समुद्र में डूबकर मछलियों का भोजन न बन जाएं।
लेकिन ईरान ने इन आत्मघाती नावों से कहीं अधिक घातक हथियार का इस्तेमाल किया। उसने उनके दिलों में डर को जिंदा रखकर उन्हें जीते-जी मौत का एहसास करा दिया।
अब इस चालक दल का हर व्यक्ति जीवन भर उन 286 दिनों को याद करके अपने डर का जिक्र करता रहेगा।
ईरानी समुद्र ने जहां लोहे के इस विशाल टुकड़े को जंग लगा दिया, वहीं ईरानी रणनीति ने इसके चालक दल के शरीर, सोच और नसों को भी कमजोर कर दिया है। दोनों ही तबाही के कगार पर हैं और दोनों की स्थिति को फिर से सामान्य करना बहुत मुश्किल है।
जो नौसैनिक बेड़ा फ़ारस की खाड़ी को जीतने के घमंड में युद्ध का बिगुल बजाता हुआ पहुंचा था, वह अब इतना जर्जर हो चुका है कि अमेरिका वापस भी नहीं पहुंच सका और उसे उत्तरी थाईलैंड के लाएम चाबांग बंदरगाह पर ही रुकना पड़ा।
हालांकि इस पूरे बंदरगाह को बंद करके इस झूठी ताकत के खोखले और विशालकाय बेड़े की मरम्मत तथा उसके चालक दल की देखभाल की जा रही है, लेकिन सोशल मीडिया ऐसे वीडियो क्लिप से भरा हुआ है, जिनमें आम लोग इस बेड़े की तस्वीरें और वीडियो दिखाकर अमेरिकी शक्ति और इस नाकारा बेड़े की आलोचना कर रहे हैं।
यही प्रतिरोध मोर्चे की जीत है कि उसने पूरी दुनिया के लोगों को इस योग्य बना दिया है कि वे अब बिना किसी डर के बातिल ताकतों की खुलकर आलोचना करने और उनके अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं, क्योंकि उन्हें अच्छी तरह अंदाजा हो चुका है कि हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और होते हैं।













