ईरान का प्रतिरोध और अमेरिका की बेबसी!

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ईरान का प्रतिरोध और अमेरिका की बेबसी!

जब दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति किसी देश पर हमला करती है, तो आमतौर पर यह दावा भी किया जाता है कि दुश्मन की सैन्य शक्ति को कुछ ही दिनों में खत्म कर दिया जाएगा, उसे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया जाएगा और युद्ध को मनचाहे परिणाम तक पहुंचा दिया जाएगा। ईरान के मामले में भी कुछ ऐसा ही अनुमान लगाया गया था।

अमेरिका के पास अत्याधुनिक युद्धक विमान, मिसाइलें, नौसैनिक बेड़े, उपग्रहों से निगरानी की क्षमता, दुनिया भर में सैन्य अड्डे और अपार वित्तीय संसाधन हैं, जबकि ईरान को उसके मुकाबले अपेक्षाकृत कमजोर सैन्य शक्ति माना गया। लेकिन युद्ध ने यह साबित कर दिया कि अत्याधुनिक हथियार किसी देश को नुकसान तो पहुंचा सकते हैं, लेकिन उसकी राजनीतिक प्रतिरोध क्षमता को जरूरी नहीं कि खत्म कर दें।

युद्ध का फैसला केवल इस बात से नहीं होता कि किसने कितने बम गिराए या कितने ठिकानों को नष्ट किया। असली सवाल यह है कि युद्ध शुरू करने वाले देश ने अपने राजनीतिक और सैन्य उद्देश्य हासिल किए या नहीं। यदि कोई शक्तिशाली देश भारी हमलों के बावजूद अपने विरोधी को अपनी शर्तें मानने पर मजबूर न कर सके, युद्ध समाप्त न कर सके और लगातार जवाबी कार्रवाइयों का सामना करता रहे, तो इसे पूरी जीत कहना मुश्किल होता है। इस युद्ध में ईरान को निश्चित रूप से भारी नुकसान हुआ है, लेकिन ईरान का नुकसान और अमेरिका की जीत एक ही बात नहीं है।

आज कई महीने बाद भी मूल सवाल यही है कि अमेरिका ने यह युद्ध शुरू क्यों किया था और वह अपने उद्देश्य तक कहां पहुंचा? अगर उद्देश्य ईरान को झुकाना, उसका प्रतिरोध खत्म करना और उसे अपनी शर्तें स्वीकार करने पर मजबूर करना था, तो युद्ध अब तक जारी क्यों है? मिसाइल हमले, नौसैनिक कार्रवाइयां, आर्थिक दबाव, प्रतिबंध और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव यह बता रहे हैं कि मामला अभी किसी निर्णायक परिणाम तक नहीं पहुंचा है।

5 सितंबर 2026 को ईरान और अमेरिका के बीच समुद्री मोर्चे पर एक बार फिर गंभीर तनाव पैदा हुआ। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने अमेरिकी नौसैनिक जहाजों को बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाने की कोशिश की, जबकि अमेरिकी सेना ने जवाब में तीन ईरानी तेल टैंकरों को निशाना बनाया। इस तरह युद्ध किसी स्पष्ट अंत के बजाय हमलों और जवाबी हमलों के सिलसिले में आगे बढ़ रहा है। इससे एक बुनियादी सवाल पैदा होता है: अगर ईरान हार चुका है, तो युद्ध अभी तक खत्म क्यों नहीं हुआ?

अमेरिका के लिए समस्या केवल ईरान का प्रतिरोध नहीं, बल्कि इस युद्ध की बढ़ती सैन्य कीमत भी है। अमेरिकी शीर्ष सैन्य नेतृत्व के कुछ सदस्यों ने चेतावनी दी है कि ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाइयों को लंबे समय तक जारी रखने से दुनिया के दूसरे क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य जिम्मेदारियां प्रभावित हो सकती हैं। लंबे युद्ध के परिणामस्वरूप अमेरिकी सैन्य संसाधनों, हथियारों और सैनिकों पर बढ़ता दबाव अब स्वयं वॉशिंगटन में चिंता का कारण बन रहा है।

पेंटागन में हथियारों के भंडार से संबंधित संवेदनशील जानकारी के लीक होने की जांच ने भी इस दबाव को सामने ला दिया है। ईरान युद्ध के दौरान अमेरिकी अत्याधुनिक हथियारों और गोला-बारूद के भंडार पर पड़ने वाले दबाव से संबंधित जानकारी के लीक होने की जांच में ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के लगभग 50 सैन्य और नागरिक कर्मचारियों का पॉलीग्राफ परीक्षण किया गया। इसका मतलब यह नहीं है कि इन सभी कर्मचारियों को किसी अपराध का दोषी माना गया है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में जांच होना इस मामले की असाधारण संवेदनशीलता को जरूर दर्शाता है।

यहां अमेरिका की शक्ति का एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है। एक ओर वॉशिंगटन अपनी अभूतपूर्व सैन्य शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी रक्षा व्यवस्था में लंबे युद्ध, सीमित हथियारों के भंडार और सैन्य संसाधनों पर बढ़ते दबाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति जरूर है, लेकिन उसके लिए भी लंबे युद्ध की एक कीमत होती है, खासकर तब जब उसकी सेना एक ही समय में दुनिया के कई हिस्सों में जिम्मेदारियां निभा रही हो।

ईरान की ताकत केवल उसकी मिसाइलों में नहीं है। उसका भौगोलिक स्थान, फारस की खाड़ी में उसकी स्थिति, होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर उसका प्रभाव, व्यापक क्षेत्रीय नेटवर्क और लंबे युद्ध को सहन करने की क्षमता उसे एक कठिन प्रतिद्वंद्वी बनाती है। इसी कारण ईरान के खिलाफ युद्ध का प्रभाव केवल ईरानी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। खाड़ी में एक नौसैनिक कार्रवाई वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकती है और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में मामूली तनाव भी पूरी दुनिया के तेल बाजार को हिला सकता है।

यही कारण है कि युद्ध अब केवल ईरान और अमेरिका का मामला नहीं रह गया है। इसके प्रभाव वैश्विक ऊर्जा, समुद्री व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था तक पहुंच चुके हैं। 5 सितंबर की ताजा झड़पों के बाद भी स्थिति अनिश्चित बनी रही और तेल की कीमतों पर फिर दबाव देखा गया। दूसरी ओर सातवें महीने में प्रवेश कर चुके इस युद्ध को लेकर खुद अमेरिका में भी थकान और मतभेद बढ़ रहे हैं। रॉयटर्स के अनुसार, हाल के एक सर्वेक्षण में केवल 31 प्रतिशत अमेरिकियों ने युद्ध का समर्थन किया, जबकि बढ़ती ईंधन कीमतें और युद्ध से पैदा हुई थकान जनता की बेचैनी बढ़ा रही हैं।

इस पूरी स्थिति को समझने के लिए एक बुनियादी अंतर ध्यान में रखना जरूरी है: किसी देश को नुकसान पहुंचाना और उसे हराना दो अलग-अलग बातें हैं। अमेरिका ईरान के सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकता है, उसके बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकता है और उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकता है, लेकिन वास्तविक सफलता तब होती जब वह ईरान को अपने मूल राजनीतिक फैसले बदलने और अमेरिकी शर्तें स्वीकार करने पर मजबूर कर देता। अब तक ऐसा नहीं हुआ है।

इतिहास भी यही बताता है कि अत्याधुनिक हथियार हमेशा राजनीतिक जीत की गारंटी नहीं होते। वियतनाम से लेकर अफगानिस्तान तक कई युद्धों ने साबित किया है कि किसी देश की इमारतों और सैन्य ठिकानों को नष्ट करना आसान है, लेकिन उसकी राजनीतिक प्रतिरोध क्षमता को खत्म करना कहीं अधिक कठिन है। युद्ध युद्धभूमि से निकलकर राजनीतिक इच्छाशक्ति, जनता के प्रतिरोध, अर्थव्यवस्था और दीर्घकालीन रणनीति की परीक्षा बन जाता है।

ईरान के मामले में अमेरिका ने निश्चित रूप से अपनी सैन्य शक्ति का भरपूर इस्तेमाल किया और ईरान को भारी नुकसान पहुंचाया, लेकिन वह इस नुकसान को अभी तक निर्णायक राजनीतिक जीत में नहीं बदल सका है। दूसरी ओर ईरान भी अजेय नहीं है और उसे मानवीय, आर्थिक और सैन्य नुकसान उठाना पड़ा है। लेकिन युद्ध का परिणाम केवल नुकसान की मात्रा से तय नहीं होता; असली सवाल यह होता है कि आखिर में कौन अपने मूल राजनीतिक उद्देश्य से पीछे हटा।

आज अमेरिका के सामने यही कठिनाई है। वह युद्ध शुरू करने की ताकत रखता है, लेकिन हर युद्ध को अपनी इच्छा के अनुसार समाप्त करने की ताकत रखना अलग बात है। यदि कई महीनों के युद्ध के बाद भी ईरान प्रतिरोध कर रहा हो, युद्ध समाप्त न हो रहा हो, अमेरिकी सैन्य नेतृत्व लंबे समय तक चलने वाली कार्रवाइयों के प्रभावों को लेकर चिंता व्यक्त कर रहा हो, हथियारों के भंडार पर सवाल उठ रहे हों और अमेरिकी जनता में युद्ध के प्रति नाराजगी बढ़ रही हो, तो कम से कम यह जरूर कहा जा सकता है कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई आसान और निर्णायक जीत में नहीं बदल सकी।

दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति होना और हर युद्ध जीतने की शक्ति रखना एक ही बात नहीं है। बमबारी शक्ति का प्रदर्शन हो सकती है, लेकिन राजनीतिक जीत की गारंटी नहीं। अमेरिका ने ईरान को घायल जरूर किया है, लेकिन वह खुद भी इस युद्ध की कीमत, दबाव और राजनीतिक परिणामों से सुरक्षित नहीं रहा। जिस युद्ध को वॉशिंगटन ने अपनी शक्ति के प्रदर्शन के रूप में शुरू किया था, वह अब स्वयं अमेरिकी शक्ति की सीमाओं की परीक्षा बन चुका है।

ईरान शायद इस युद्ध में घायल हुआ हो, लेकिन अमेरिका भी पूरी तरह सुरक्षित और बेदाग नहीं निकल पाया है।

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