शैतान से मत डरो, बल्कि अपने नफ़्स से सावधान रहो!” आयतुल्लाह हाएरी शीराज़ी ने सूरए यूसुफ़ की आयत 42 की व्याख्या करते हुए शैतान की शक्ति को बढ़ा-चढ़ाकर देखने तथा तिलिस्म और जादू जैसी बातों को एक वैचारिक भूल बताया। उन्होंने कहा कि इब्लीस की चाल भी अल्लाह की अनुमति और उसकी मसलहत के दायरे में नियंत्रित है।
आज की वैचारिक समस्याओं में से एक यह है कि इब्लीस, तिलिस्म और जादू-टोने को बहुत बड़ा खतरा समझ लिया जाए और वास्तविक दुश्मन यानी “नफ़्स की इच्छाओं” से ग़ाफ़िल हो जाएं। ऐसी सोच इंसान को अल्लाह पर भरोसा करने के बजाय शैतान के काल्पनिक भय में उलझा देती है। इसी संदर्भ में दिवंगत आयतुल्लाह हाएरी शीराज़ी के मार्गदर्शक कथन को प्रस्तुत किया गया है।
अल्लाह कहता है कि बार-बार “शैतान, शैतान, शैतान” मत कहते रहो। केवल उससे क्यों डरते हो? मुझसे डरो। मेरे आदेश और अनुमति के बिना कुछ नहीं होता। अपने मन को शैतान के विचारों से मत भरो और इस तरह भयभीत मत हो जाओ कि अपनी ही परछाईं से डरने लगो और हर बात में “शैतान” देखने लगो।
सूरए यूसुफ़ में आता है:
وَ قالَ لِلَّذی ظَنَّ أَنَّهُ ناجٍ مِنْهُمَا اذْکُرْنی عِنْدَ رَبِّکَ فَأَنْساهُ الشَّیْطانُ ذِکْرَ رَبِّهِ فَلَبِثَ فِی السِّجْنِ بِضْعَ سِنینَ
“और यूसुफ़ ने उन दोनों में से जिस व्यक्ति के बारे में समझा कि वह रिहा हो जाएगा, उससे कहा कि अपने स्वामी (मिस्र के बादशाह) के पास मेरा ज़िक्र करना। लेकिन शैतान ने उसे अपने स्वामी के पास यूसुफ़ का ज़िक्र करना भुला दिया और यूसुफ़ कई वर्षों तक जेल में रहे।”
अल्लाह बताता है कि शैतान का काम इतना ही है कि वह हज़रत यूसुफ़ (अ.) के उस साथी को कुछ वर्षों तक यूसुफ़ को याद करने से ग़ाफ़िल कर दे। इससे अधिक उसकी कोई शक्ति नहीं थी।
इसके बाद मिस्र के बादशाह ने एक ऐसा सपना देखा जिसकी सही ताबीर कोई नहीं बता सका। अल्लाह ने उसके मन में ऐसा सपना डाला था जो भविष्य के लिए महत्वपूर्ण था।
इसी घटना के बाद हज़रत यूसुफ़ (अ.) जेल से बाहर आए और मिस्र के खज़ानों के प्रभारी नियुक्त हुए। उन्हें व्यापक अधिकार दिए गए। यदि वह उसी दिन जेल से रिहा हो जाते, तो संभव था कि परिस्थितियां पहले जैसी ही रहतीं और उन्हें फिर ज़ुलैखा के घर लौटना पड़ता तथा उसी स्थिति में रहना पड़ता। लेकिन कुछ वर्षों बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं और उन्हें मिस्र के खज़ानों पर अधिकार प्राप्त हुआ।
यही शैतान की वास्तविक सीमा है। उसकी भूमिका इसी हद तक है:
فَأَنْساهُ الشَّیْطانُ ذِکْرَ رَبِّهِ فَلَبِثَ فِی السِّجْنِ بِضْعَ سِنینَ
यदि शैतान हज़रत यूसुफ़ (अ.) की बात को उनके साथी को न भुलाता तो क्या यह यूसुफ़ (अ.) के लिए बेहतर होता? नहीं, उसका भूल जाना ही अंततः यूसुफ़ (अ.) के लिए बेहतर साबित हुआ।
इसलिए शैतान से अत्यधिक भयभीत होने के बजाय अपने आचरण और नफ़्स पर ध्यान देना चाहिए। अल्लाह फ़रमाता है:
یَا أَیُّهَا الَّذِینَ آمَنُوا عَلَیْکُمْ أَنْفُسَکُمْ لَا یَضُرُّکُمْ مَنْ ضَلَّ إِذَا اهْتَدَیْتُمْ
“ऐ ईमान वालों! अपने आप की चिंता करो। यदि तुम हिदायत पर हो तो जो गुमराह हुआ है, वह तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचा सकता। तुम सबको अल्लाह की ओर लौटकर जाना है और वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों से अवगत कराएगा।”
“من ضلّ” अर्थात जो गुमराह हुआ, उससे आशय इब्लीस भी लिया गया है। इसलिए अपने नफ़्स की निगरानी करो; यही तुम्हारे लिए सबसे बड़ा इम्तिहान है।
आयतुल्लाह हाएरी शीराज़ी ने कहा:
“नफ़्स की पैरवी से बचो, क्योंकि ईश्वर के मार्ग से भटकाने में इससे बड़ा कोई मरुस्थली दैत्य नहीं है।”













