हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी ने अपने लेख में कर्बला की ऐतिहासिक विरासत से लेकर वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों तक नेतृत्व की निरंतरता और दूरदर्शिता के महत्व को रेखांकित किया है। उन्होंने कहा कि जिस तरह इमाम सज्जाद अ.स. और हज़रत ज़ैनब स.अ.ने कर्बला के बाद सत्य और न्याय का संदेश जीवित रखा, उसी तरह नेतृत्व में निरंतरता विरोधियों की साज़िशों को विफल कर सकती है। लेख में विशेषज्ञ परिषद के निर्णय, विलायत-ए-फ़क़ीह और साम्राज्यवाद की पराजय को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है।
सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी निदेशक, जामिया इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम सदर इमामबाड़ा, जौनपुर ने कहां,इतिहास के हर मोड़ पर असत्य और अन्याय की शक्तियों ने यह घिनौना सपना देखा है कि सत्य के ध्वजवाहकों को समाप्त करके उनकी विचारधारा का दीपक बुझाया जा सकता है।
कर्बला के मैदान में जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफ़ादार साथियों ने शहादत का जाम पिया, तो यज़ीदी शक्तियों ने यह समझ लिया कि अब दीन-ए-मुहम्मदी की बागडोर उनके हाथों में आ गई है और वे उसे जिस दिशा में चाहें, मोड़ सकती हैं। लेकिन हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम और हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के दूरदर्शितापूर्ण नेतृत्व और फौलादी संकल्प ने इस साज़िश को मिट्टी में मिला दिया।
शब्बीर के बाद सज्जाद का वह तौर-ए-अमल, जैसे बदला ही नहीं नाव का खेने वाला;
यह शेर केवल एक ऐतिहासिक सच्चाई को प्रतिबिंबित नहीं करता, बल्कि ईश्वरीय परंपरा के उस उज्ज्वल सिद्धांत को भी दर्शाता है, जिसके अंतर्गत मार्गदर्शन का ध्वज कभी झुकता नहीं है। मार्गदर्शक बदलते हैं, व्यक्ति शहीद होते हैं, लेकिन सत्य की विचारधारा की मुक्ति-नौका का खेवनहार हमेशा उसी ईश्वरीय योजना और दूरदर्शिता के साथ सामने आता है, जो तूफ़ानों की दिशा बदल देती है।
विशेषज्ञ परिषद का ऐतिहासिक निर्णय और पूर्ण दूरदर्शिता:
वर्तमान दौर में भी साम्राज्यवाद और उसके सभी सहयोगी शासक उसी पुराने भ्रम में मुब्तेला थे। शहीद इस्लामी क्रांति के नेता हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई ताबा स़राहु के मार्ग में बाधाएँ खड़ी करने और उनकी शहादत के बाद विलायत की व्यवस्था को कमज़ोर करने के लिए इस्लाम के दुश्मनों ने दीर्घकालिक साज़िशें रच रखी थीं। वे यह गुमान कर बैठे थे कि शायद मज़लूमों को छाया देने वाले इस विशाल और ऊँचे वृक्ष के गिरने से क्रांति की जड़ें हिल जाएँगी।
लेकिन मजलिस-ए-ख़ुबरेगान-ए-रहबरी ने अतीत के अनुभवों से सीख लेते हुए, वर्तमान परिस्थितियों की नब्ज़ पहचानकर और भविष्य के प्रति गहरी दूरदर्शिता का प्रदर्शन करते हुए, शहीद रहबर के हाथों लगाए गए छायादार वृक्ष के उत्तराधिकारी का चयन किया। उसने ऐसा समयोचित और क्रांतिकारी निर्णय लिया कि दुनिया हैरान रह गई। हज़रत आयतुल्लाह सैयद मुजतबा ख़ामेनेई (हफ़्ज़हुल्लाह) का चयन इस बात की खुली घोषणा था कि इस विचारधारा में चिंतन, दूरदर्शिता और साहस का स्रोत कभी सूख नहीं सकता।
साम्राज्यवाद के छल का अंत और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के असा का चमत्कार:
इस चयन ने साम्राज्यवाद और उसकी क्षेत्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोगी शक्तियों के सारे हौसले पस्त कर दिए। दशकों की मेहनत और अरबों डॉलर खर्च करके वे जिस छलपूर्ण निरंतरता को स्थापित करना चाहते थे, वह इस एक निर्णय की चोट से रेत की दीवार की तरह ढह गई।
यह दृश्य बिल्कुल वैसा ही था, जैसे फ़िरऔन के दरबार में जादूगरों के झूठे जादू और रस्सियों से बने साँपों को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के असा ने पल भर में निगल लिया था। इस जागरूक नेतृत्व और विलायत-ए-फ़क़ीह की निरंतरता ने असत्य के सभी छल-कपट और भ्रमजाल को चकनाचूर कर दिया।
समय के फ़िरऔनों का अंजाम और उनकी पुकार:
आज इतिहास को स्वयं को दोहराते हुए देखा जा सकता है। फ़िरऔन के अहंकार में मुब्तला वे शक्तियाँ, जो कल तक पूरी दुनिया को अपनी उँगलियों पर नचाने का दावा करती थीं, आज अपने ही बनाए हुए दलदल में डूबती जा रही हैं।
विनम्रता और पराजय:
वे शक्तियाँ, जो कभी धमकियाँ दिया करती थीं, आज डूबते हुए इंसान की तरह गिड़गिड़ाकर मदद की गुहार लगा रही हैं।
ईश्वरीय परंपरा:
यह इस अटल सच्चाई की पुनः पुष्टि है कि अत्याचार की उम्र चाहे कितनी ही लंबी क्यों न हो, उसे एक न एक दिन पराजय का सामना करना ही पड़ता है।
यही कारण है कि इतिहास की यह कहावत आज की परिस्थितियों पर अक्षरशः सही उतरती है कि हर फ़िरऔन के लिए एक मूसा होता है। अर्थात प्रत्येक फ़िरऔन के लिए एक मूसा मौजूद होता है, जो उसके अहंकार को मिट्टी में मिला देता है।
नेतृत्व का यह नया अध्याय इस बात का प्रमाण है कि अल्लाह के प्रकाश को अपनी फूँकों से बुझाने की कोशिश करने वाले स्वयं अपने ही अंधकार में गुम हो चुके हैं।













