माहे मुबारक रमज़ान, तज़किया-ए-नफ़्स और उन्स बा क़ुरआन का दोबारा मौक़ा है

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माहे मुबारक रमज़ान, तज़किया-ए-नफ़्स और उन्स बा क़ुरआन का दोबारा मौक़ा है

 हुज्जतुल इस्लाम मुहम्मद हसन शाबानअली ने माहे मुबारक रमज़ान को माहे नुज़ूल-ए-क़ुरआन, ज़ियाफ़त ए इलाही और ख़ुदसाज़ी, तहज़ीब-ए-नफ़्स तथा रहमत व मग़फ़िरत-ए-इलाही से इस्तिफ़ादा का क़ीमती मौक़ा क़रार दिया।

 हुज्जतुल इस्लाम मुहम्मद हसन शाबानअली, रईस अकीदती-सियासी इंतिज़ामी उस्तान हमदान ने माहे मुबारक रमज़ान की आमद पर अपने पैग़ाम में इस बाबरकत महीने की तबरीक पेश की और कहा कि रमज़ान माहे नुज़ूल-ए-क़ुरआन, ज़ियाफ़त-ए-ख़ुदावंदी और रूहानी तरक़्क़ी का बेहतरीन ज़रिया है।

उन्होंने अपने पैग़ाम में आयत-ए-शरीफ़ा
«شَهْرُ رَمَضانَ الَّذی أُنْزِلَ فیهِ الْقُرْآنُ هُدیً لِلنَّاسِ وَ بَیِّناتٍ مِنَ الْهُدی‌ وَ الْفُرْقانِ»

(सूरह बक़रह, आयत 185)
का हवाला देते हुए कहा कि माहे रमज़ान बहार-ए-क़ुरआन, नूर व हिदायत का महीना, दिलों को गुनाह की गर्द से पाक करने का महीना है। यह वह महीना है जिसमें नफ़्स अक़्ल व ईमान की ज़ंजीर में बंधकर बंदगी की राह पर क़ायम होता है।

उन्होंने कहा कि यह महीना रहमत व ग़ुफ़रान की बारिश का महीना है, जिसमें आसमान के दरवाज़े बंदों के लिए खोल दिए जाते हैं और मग़फ़िरत की नसीम रूहों को तरावट बख़्शती है। रमज़ान दरअसल ख़ुदा की ज़ियाफ़तगाह है, जहाँ रोज़ा जो तस्लीम व बंदगी की अलामत है इंसान को क़ुर्ब-ए-इलाही तक पहुँचाता है।

उन्होंने अल्लाह तआला का शुक्र अदा किया कि एक बार फिर इस बाबरकत महीने तक पहुँचने और उसकी रूहपरवर फ़िज़ा में तहज़ीब व तज़किया की राह पर गामज़न होने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाई। साथ ही उन्होंने कहा कि सहर की नूरानी घड़ियों और इफ़्तार के मलकोती लम्हों में मुनाजात व ख़लवत-ए-मअबूद का लुत्फ़ उठाना बड़ी नेमत है।

आख़िर में उन्होंने माहे मुबारक रमज़ान की आमद पर दुनिया भर के मुसलमानों, ख़ुसूसन दारुल-मोमिनीन उस्तान हमदान के अवाम, निज़्म व अम्न के मुहाफ़िज़ों और इंतिज़ामी इदारे के ख़िदमतगुज़ार अमले को दिली मुबारकबाद पेश की और दुआ की कि अल्लाह तआला सबको इस महीने की बरकात से भरपूर फ़ायदा उठाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए तथा हम सब इस इलाही इम्तेहान में सरख़रू हों और रमज़ान के बेपायाँ ज़खीरे से अपने मुस्तक़बिल के लिए बेहतरीन तोशा हासिल कर सकें।

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