क़नाअत के ज़रिए इंसान ज़िल्लत, क़र्ज़ और अख़्लाक़ी सुक़ूत से महफ़ूज़ रहता है

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क़नाअत के ज़रिए इंसान ज़िल्लत, क़र्ज़ और अख़्लाक़ी सुक़ूत से महफ़ूज़ रहता है

हुसैन अंसारियान ने तेहरान की मस्जिद हज़रत अमीर (अ.स.) में माह-ए-मुबारक रमज़ान की पहली शब ख़िताब करते हुए कहा कि क़नाअत इंसान को ज़िल्लत, क़र्ज़दारी और अख़लाक़ी सुक़ूत से महफ़ूज़ रखती है, जबकि हिर्स व तमअ इंसान को ज़िल्लत व ख़्वारी की तरफ़ ले जाती हैं।

 तेहरान की मस्जिद हज़रत अमीर (अ) में पवित्र रमज़ान महीने की पहली रात को संबोधित करते हुए हुज्जतुल-इस्लाम हुसैन अंसारियान ने कहा कि  क़नाअत मनुष्य को अपमान, कर्ज़ और नैतिक पतन से सुरक्षित रखती है, जबकि लालच और अति महत्वाकांक्षा (हिर्स) मनुष्य को अपमान और नीचता की ओर ले जाती है।

उन्होंने पैगंबरों और ईश्वरीय संतों औलिया-ए-इलाही के आचरण को आदर्श बताते हुए कहा कि वास्तविक सम्मान और प्रतिष्ठा  सादगी और गरिमापूर्ण जीवन में निहित है।

उन्होंने स्वर्गीय आयतुल्लाहिल उज़मा अराकी का उल्लेख करते हुए कहा कि वे तपस्या (ज़ुह्द), धर्मपरायणता (तक़वा) और ज्ञान व अमल की प्रकाशमान मिसाल थे, और आधी सदी तक हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम के बड़े विद्वान उनके पीछे नमाज़ अदा करते रहे, जो उनके न्याय और धर्मपरायणता का स्पष्ट प्रमाण है।

हुज्जतुल इस्लाम अंसारियान ने एक तपस्वी विद्वान आख़ुंद मुल्लाह मुहम्मद कबीर का किस्सा सुनाया, जो हकदार होने के बावजूद "सहम-ए-इमाम" (इमाम का हिस्सा) लेने से बचते थे और खेती-बाड़ी के माध्यम से संतोष (क़नाअत) के साथ जीवन व्यतीत करते थे। उन्होंने कहा कि यही आचरण मनुष्य को आवश्यकता और मोहताजी से बचाता है।

उन्होंने रसूल-ए-अकरम स.ल.व. की दुआ "इफ़्फ़त व कफ़ाफ़" जीविका में संतोष) का हवाला देते हुए समझाया कि 'इफ़्फ़त' पाप से सुरक्षा और 'कफ़ाफ़' ऐसी अर्थव्यवस्था/आजीविका है जिसमें मनुष्य दूसरों का मोहताज न हो। इसी तरह उन्होंने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) के सादगी भरे शासनकाल के जीवन की मिसाल देते हुए कहा कि आपने बैतुल-माल (सार्वजनिक कोष) को निजी उपयोग में नहीं लगाया और हमेशा न्याय व सावधानी को प्राथमिकता दी।

उन्होंने कुरान करीम को जीवंत सत्य (ज़िंदा हक़ीक़त) बताते हुए कहा कि जिस प्रकार कुरान ने एक ज़ाहिद की दुआ से आग को बुझा दिया, उसी प्रकार यह अहंकार (तकब्बुर), हसद और दिखावे (रिया) की आग को भी शांत कर सकता है।

अंत में उन्होंने रोज़े की महानता का वर्णन करते हुए कहा कि हदीस के अनुसार "الصوم لی و انا اجزی بہ" (रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला दूंगा), अर्थात रोज़ा अल्लाह के लिए है और उसका प्रतिफल (अज्र) वह स्वयं प्रदान करता है, जो इस इबादत की बेमिसाल अहमियत को प्रकट करता है।

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