ईरानी राष्ट्र का धैर्य और दृढ़ता अहले बैत अ.स. की कृपा का एक प्रतीक है

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ईरानी राष्ट्र का धैर्य और दृढ़ता अहले बैत अ.स. की कृपा का एक प्रतीक है

 हरम ए हज़रत मासूमा स.अ. के वक्ता हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हबीबुल्लाह फरहज़ाद ने कहा कि दुआ, सदक़ा और इमाम ज़माना हज़रत मेंहदी अ.ज. की विशेष कृपा अनेक आपदाओं और संकटों को टालने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि इस्लामी समाज पर आने वाली बहुत-सी मुसीबतें हज़रत वली-ए-असर (अ.ज.) की दुआओं की बरकत से दूर हो जाती हैं।

हरम ए हज़रत मासूमा स.अ. के वक्ता हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हबीबुल्लाह फरहज़ाद ने कहा कि दुआ, सदक़ा और इमाम ज़माना हज़रत मेंहदी अ.ज. की विशेष कृपा अनेक आपदाओं और संकटों को टालने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि इस्लामी समाज पर आने वाली बहुत-सी मुसीबतें हज़रत वली-ए-असर (अ.ज.) की दुआओं की बरकत से दूर हो जाती हैं।

इसी प्रकार दुश्मनों के सामने ईरानी राष्ट्र की सुरक्षा, दृढ़ता और अडिगता भी ईश्वरीय सहायता तथा अहलुलबैत (अ.) की विशेष कृपा का परिणाम है। इसलिए मोमिनों को इन नेमतों की कद्र करनी चाहिए।

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हबीबुल्लाह फरहज़ाद ने शुक्रवार की रात हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.अ.) के पवित्र हरम में अपने संबोधन में पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स.ल.) और अहलुलबैत (अ.) पर दुरूद (सलवात) भेजने के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह सबसे श्रेष्ठ ज़िक्र और दुआ है।

उन्होंने कहा कि शुक्रवार का दिन और रात हज़रत वली-ए-असर इमाम मेंहदी (अ.ज.) से विशेष रूप से संबंधित हैं और इस दिन उनसे आध्यात्मिक संबंध को नवीनीकृत करने की बहुत अधिक सिफारिश की गई है।

उन्होंने इमाम मेंहदी (अ.ज.) के शेंख मुफ़ीद के नाम प्रसिद्ध तौक़ीअ का उल्लेख करते हुए कहा कि इमाम ज़माना (अ.ज.) अपने अनुयायियों के हालात और कर्मों से हमेशा अवगत रहते हैं और उन्हें कभी नहीं भूलते। यदि उनकी निरंतर दुआएँ और कृपा न होतीं, तो मोमिनों के समाज पर अनेक विपत्तियाँ उतरतीं और दुश्मनों को उन्हें समाप्त करने का अवसर मिल जाता।

उन्होंने क़ुरआन की आयत "और कह दीजिए: कर्म करते रहो, शीघ्र ही अल्लाह, उसका रसूल और मोमिन तुम्हारे कर्मों को देखेंगे" (सूरह अत-तौबा 9:105) का हवाला देते हुए कहा कि बंदों के कर्म पैग़म्बर (स.) और पवित्र इमामों (अ.) के समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं और वे मोमिनों के मार्गदर्शन तथा उनकी मग़फ़िरत के लिए दुआ करते हैं।

उन्होंने अंत में अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अ.स. की उस रिवायत का उल्लेख किया जिसमें आपने अपने एक बीमार साथी की कुशल-क्षेम पूछी थी। उन्होंने कहा कि अहलुलबैत (अ.) मोमिनों के दुख, बीमारी और कठिनाइयों से उदासीन नहीं रहते, बल्कि उनके कष्टों से दुःखी होते हैं।

इसलिए मोमिनों को चाहिए कि वे इमाम ज़माना (अ.ज.) से अपने आध्यात्मिक संबंध को मजबूत रखें, ग़फ़लत, निराशा और दुनियावी मोह से दूर रहें तथा दुआ, तवस्सुल, नेक अमल और विलायत से अपने संबंध को सुदृढ़ बनाकर उनकी विशेष कृपा प्राप्त करने का प्रयास करें।

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