क़ुम-ए-मुक़द्दसा के इमाम जुमा आयतुल्लाह सय्यद मुहम्मद सईदी ने कहा है कि अरबईन-ए-हुसैनी मुस्लिम समुदाय के लिए दृढ़ता), धैर्य और स्थिरता का महान पाठ है। इमाम हुसैन (अ) ने अपने क़याम के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि वास्तविक सफलता बाहरी वर्चस्व में नहीं, बल्कि ईश्वरीय लक्ष्यों की पूर्ति और बातिल व्यवस्था को कमज़ोर करने में है यही संदेश आज भी मुसलमानों के लिए राह-दिखाने वाला मशाल-ए-राह है।
क़ुम-ए-मुक़द्दसा के इमाम जुमा आयतुल्लाह सय्यद मुहम्मद सईदी ने कहा है कि अरबईन-ए-हुसैनी मुस्लिम समुदाय के लिए दृढ़ता), धैर्य और स्थिरता का महान पाठ है। इमाम हुसैन (अ) ने अपने क़याम के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि वास्तविक सफलता बाहरी वर्चस्व में नहीं, बल्कि ईश्वरीय लक्ष्यों की पूर्ति और बातिल व्यवस्था को कमज़ोर करने में है यही संदेश आज भी मुसलमानों के लिए राह-दिखाने वाला मशाल-ए-राह है।
जुमे के ख़ुत्बे को संबोधित करते हुए आयतुल्लाह सईदी ने कहा कि अरबईन की आत्मा तक़्वा, ख़ुदा की राह में क़याम, दुश्मन के सामने समर्पण न करना और मुनाफ़िक़ों पर भरोसा न करना है। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन (अ) ने अपने व्यवहार से यह सबक़ दिया कि यदि मनुष्य सब्र और इस्तिक़ामत का दामन न छोड़े, तो अंततः सफलता उसी का मुक़द्दर बनती है। उन्होंने इमाम हुसैन (अ) के फ़रमान "صَبراً بَنِی الْکِرَام" (धैर्य रखो, हे सम्मानित संतानों!) का हवाला देते हुए कहा कि यही सहनशीलता करबला के संदेश का मूल स्तंभ है।
उन्होंने कहा कि मुहर्रम और सफ़र के दिनों में निरंतर अज़ादारी और अरबईन के अवसर पर लाखों श्रद्धालुओं की पैदल उपस्थिति इसी दृढ़ता और धार्मिक प्रतिबद्धता का व्यावहारिक प्रमाण है।
आयतुल्लाह सईदी ने राष्ट्रीय मीडिया की सेवाओं की प्रशंसा करते हुए कहा कि कठिन परिस्थितियों और हालिया युद्ध-संकटों के दौरान मीडिया ने जनता की आवाज़ को प्रभावी ढंग से दुनिया तक पहुँचाया और अपने मोर्चे से पीछे नहीं हटा।
उन्होंने लेबनान की प्रतिरोधी आंदोलन हिज़्बुल्लाह द्वारा आयतुल्लाह सय्यद मुज्तबा ख़ामनेई श से नवीनीकृत बै'अत का उल्लेख करते हुए कहा कि ईरानी सर्वोच्च नेता ने लेबनान के मुजाहिदीन का समर्थन जारी रखने पर बल दिया है और यह स्पष्ट किया है कि अत्याचार और आक्रामकता के सामने प्रतिरोध ही एकमात्र प्रभावी रास्ता है।
क़ुम के इमाम जुमा ने अमेरिका और सऊदी अरब द्वारा इराक़ में अल-हश्द अश-शाबी के केंद्रों पर किए गए हमलों की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि हश्द अश-शाबी ने आईएसआईएस के विरुद्ध निर्णायक भूमिका निभाई और क्षेत्र को आतंकवाद से मुक्ति दिलाने में महत्वपूर्ण सेवाएँ प्रदान कीं। उन्होंने इराक़ी सरकार से माँग की कि वह इस जनशक्ति की पूरी सुरक्षा करे और बाहरी आक्रामकता के विरुद्ध प्रभावी कदम उठाए।
उन्होंने आयतुल्लाह शेख़ फ़ज़लुल्लाह नूरी (ईरानी विद्वान, जिन्हें बादशाहत-ए-मशरूता के विरोध में फाँसी हुई) की शहादत का ज़िक्र करते हुए कहा कि उन्होंने इस्लामी शरीयत की सर्वोच्चता के लिए अपनी अंतिम साँस तक संघर्ष किया और अपनी जान क़ुर्बान कर दी।
आयतुल्लाह सईदी ने बेहयाई और बेहिजाबी को पश्चिमी सांस्कृतिक घुसपैठ करार देते हुए कहा कि ईरानी जनता, विशेष रूप से मुस्लिम महिलाएँ, अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए हमेशा स्थिर रही हैं और आगे भी इस्लामी हिजाब और इफ़्फ़त की रक्षा से पीछे नहीं हटेंगी।
पहले ख़ुत्बे में उन्होंने सूरह फ़तह की आयतों की व्याख्या करते हुए कहा कि क़ुरआन-ए-करीम के अनुसार सफलता का मानदंड केवल तात्कालिक सैन्य विजय नहीं है, बल्कि हक़ की निरंतरता, शांति की स्थापना, सही रणनीति और ईश्वरीय योजना की पूर्ति भी वास्तविक सफलता का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि सुलह-ए-हुदैबिया इस तथ्य की उज्ज्वल मिसाल है कि दिखने में कठिन फ़ैसले भी भविष्य में इस्लाम की महान विजयों का कारण बन सकते हैं।













