इस्लामी क्रांति के शहीद रहबर हज़रत आयतुल्लाहिल अज़्मा इमाम ख़ामेनेईؒ ने फ़िक़्ह के ख़ारिज़ के पाठ की शुरुआत में रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि और हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के बीच हुई आख़िरी बातचीत से संबंधित एक रिवायत की व्याख्या करते हुए कहा कि पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि का अपनी बेटी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के साथ व्यवहार, इस्लाम में महिला और परिवार के स्थान और सम्मान का बेहतरीन उदाहरण है।
उन्होंने हज़रत आयशा से वर्णित रिवायत पेश करते हुए कहा:
«ما رَأَیتُ مِنَ النّاسِ اَحداً اَشبَهَ کَلاماً وَ حَدیثاً بِرَسولِ اللهِ مِن فاطِمَة»
हज़रत आयशा कहती हैं कि मैंने लोगों में किसी को बातचीत और बोलने के अंदाज़ के मामले में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा से अधिक रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि के समान नहीं देखा।
शहीद रहबर ने इसके बाद रिवायत के इस हिस्से की व्याख्या की:
«کانَت اِذا دَخَلَت عَلَیهِ رَحَّبَ بِها وَ قَبَّل یَدَیها وَ اَجلَسَها فی مَجلِسِه»
जब हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि की सेवा में उपस्थित होतीं तो आप उनका स्वागत करते, उनके हाथों को चूमते और उन्हें अपनी जगह पर बैठाते।
उन्होंने कहा कि रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि अपनी बेटी के साथ इतना सम्मानपूर्ण व्यवहार करते थे कि उनके लिए खड़े होते, उनका स्वागत करते, उनके हाथों को चूमते और उन्हें अपनी जगह पर बैठाते थे। हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि के साथ इसी प्रकार प्रेम और सम्मान का व्यवहार करती थीं:
«فَاِذا دَخَلَ عَلَیها قامَت اِلَیهِ فَرَحَّبَت بِهِ وَ قَبَّلَت یَدَیهِ»
जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा के घर तशरीफ़ ले जाते तो वह आपके स्वागत के लिए खड़ी होतीं, आपका स्वागत करतीं और आपके हाथों को चूमतीं।
इमाम ख़ामेनेईؒ ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि की आख़िरी बीमारी के दौरान पेश आने वाली घटना की ओर भी संकेत किया। रिवायत में है:
«وَ دَخَلَت عَلَیهِ فی مَرَضِهِ فَسارَّها فَبَکَت ثُمَّ سارَّها فَضَحِکَت»
हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि की आख़िरी बीमारी के दौरान आपकी सेवा में उपस्थित हुईं। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि ने उनसे कान में कुछ कहा तो वह रोने लगीं। फिर आपने दोबारा उनसे कान में कुछ कहा तो वह मुस्कुरा दीं।
हज़रत आयशा कहती हैं:
«فَقُلتُ کُنتُ اَریٰ لِهٰذِهِ فَضلاً عَلَی النِّساءِ فَاِذا هِیَ اِمرَأَةٌ مِنَ النِّساءِ»
मैं समझती थी कि हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा को दूसरी महिलाओं पर विशेष श्रेष्ठता प्राप्त है, लेकिन जब मैंने उन्हें एक पल रोते और दूसरे पल मुस्कुराते देखा तो मेरे मन में सवाल पैदा हुआ।
हज़रत आयशा ने हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा से इसका कारण पूछा तो आपने फ़रमाया:
«اِنّی اِذَن لَبَذِرَةٌ»
अगर मैं तुम्हें यह राज़ बता दूँ तो मैं राज़ को प्रकट करने वाली हो जाऊँगी।
शहीद रहबर ने बताया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि की वफ़ात के बाद हज़रत आयशा ने दोबारा हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा से उस घटना के बारे में पूछा। उस समय हज़रत फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा ने फ़रमाया:
«اِنَّهُ اَخبَرَنی اَنَّهُ یَموتُ فَبَکَیتُ»
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि ने मुझे अपनी वफ़ात की ख़बर दी थी, जिस पर मैं रो पड़ी।
फिर फ़रमाया:
«ثُمَّ اَخبَرَنی اَنّی اَوَّلُ اَهلِهِ لُحوقاً بِهِ فَضَحِکتُ»
इसके बाद आपने मुझे बताया कि मैं उनके अहले-बैत में सबसे पहले उनसे जा मिलूँगी, जिस पर मुझे खुशी हुई और मैं मुस्कुरा दी।
इमाम ख़ामेनेईؒ ने इस रिवायत को रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि और हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के बीच गहरे प्रेम, आपसी सम्मान और आध्यात्मिक संबंध का एक उज्ज्वल उदाहरण बताया।













