आज की दुश्मनी, पैगंबर इस्लाम स.ल.व.के ज़माने से जुड़ी हुई कड़ी है। हुज्जतुल इस्लाम आ़ग़ा अमीरी

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आज की दुश्मनी, पैगंबर इस्लाम स.ल.व.के ज़माने से जुड़ी हुई कड़ी है। हुज्जतुल इस्लाम आ़ग़ा अमीरी

हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ.के पवित्र हरम में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन सैयद हुसैन आ़ग़ा आमीरी ने कहा कि इस्लामी क्रांति का आधार भी पैग़म्बर-ए-अकरम (स.ल.) की बिअसत की तरह तौहीद, न्याय और मानवीय गरिमा पर है।

इसलिए आज इस्लामी क्रांति के मोर्चे के साथ होने वाली दुश्मनी को पैग़म्बर (स.ल.) और तौहीदी आंदोलन के खिलाफ़ हुई ऐतिहासिक दुश्मनी की निरंतरता के रूप में समझना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पैग़म्बर-ए-अकरम (स.ल.) के जीवन और उनके सामने आने वाली चुनौतियों का गहराई से अध्ययन मुस्लिम उम्मत को निराशा, भय और मायूसी से बचाता है। पैग़म्बर (स.ल.) ने तौहीद को समाज में स्थापित किया, अत्याचार और शिर्क के प्रतीकों का मुकाबला किया तथा जाति, नस्ल, क़बीले, रंग और सामाजिक हैसियत के आधार पर इंसानों के बीच भेदभाव को समाप्त किया।

आ़ग़ाआमीरी ने कहा कि इस्लाम में इंसान की असली श्रेष्ठता तक़वा से है और तक़वा बढ़ने के साथ इंसान में विनम्रता भी बढ़ती है। उन्होंने पैग़म्बर (स.ल.) के मिशन के तीसरे प्रमुख आधार मानवीय गरिमा का उल्लेख करते हुए कहा कि इस्लाम ने महिलाओं, बेटियों और ग़ुलामों के प्रति जाहिलियत की अपमानजनक सोच का विरोध किया और इंसान को सम्मान का स्थान दिया।

उन्होंने कहा कि जब समाज में तौहीद, न्याय और मानवीय गरिमा व्यापक हो जाती है तो ज़ुल्म और ताग़ूत की व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है। इसी कारण पैग़म्बर (स.ल.) के विरोधियों ने उनकी दावत को रोकने और इस्लामी व्यवस्था के गठन में बाधा डालने की कोशिश की, लेकिन ईश्वरीय इच्छा के सामने उनकी योजनाएँ सफल नहीं हो सकीं।

हुज्जतुल इस्लाम आ़ग़ाआमीरी ने कहा कि इस्लामी क्रांति भी तौहीद, न्याय और मानवीय गरिमा के सिद्धांतों पर आधारित है और आज उसके हाथ में वह झंडा है जिसकी जड़ें पैग़म्बर (स.ल.) की बिअसत में हैं। इसी दृष्टिकोण से आज इस्लामी क्रांति के खिलाफ़ होने वाली दुश्मनी को तौहीदी आंदोलन और पैग़म्बर (स.ल.) के खिलाफ़ हुई ऐतिहासिक दुश्मनी के सिलसिले में देखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पैग़म्बर (स.ल.) ने अपनी पूरी ज़िंदगी कठिनाइयों और विरोध का सामना किया। इसलिए सीधे रास्ते पर चलने में आने वाली मुश्किलों से घबराकर निराश नहीं होना चाहिए। दुश्मनी के तरीके और मैदान बदल सकते हैं, लेकिन तौहीद और ताग़ूत के बीच मूल टकराव जारी रहता है।

आ़ग़ाआमीरी ने कहा कि पैग़म्बर-ए-अकरम (स.ल.) पूरी दुनिया के लिए रहमत बनकर आए, लेकिन अत्याचार और ताग़ूत के सामने उन्होंने दृढ़ता से मुकाबला भी किया। इसलिए अन्याय के खिलाफ़ खड़ा होना, यदि पैग़म्बर (स.ल. की शिक्षाओं और सही सिद्धांतों के अनुरूप हो, तो तौहीदी मार्ग का हिस्सा है।

उन्होंने अंत में कहा कि पैग़म्बर (स.ल.) की विलादत एक व्यापक इस्लामी सभ्यता के निर्माण की शुरुआत थी। आज मुस्लिम उम्मत की जिम्मेदारी है कि वह पैग़म्बर (स.ल. की सही सीरत को समझे, तौहीद, न्याय और मानवीय गरिमा के सिद्धांतों की रक्षा करे और विलायत के मार्ग पर आगे बढ़े।

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