शर्म और हया की रक्षा कमजोर होने के पीछे अतीत की अतिवादी सोच, सांस्कृतिक संस्थाओं की लापरवाही और उन गलतियों का मेल है, जिनका दोष धर्म के सिर मढ़ दिया गया। दुश्मन ने सामाजिक मतभेदों का फायदा उठाकर इस स्थिति को एक पहचान के संकट में बदल दिया है।
लेखकः सय्यद मोहम्मद ज़ाहिदैन तक़वी
हिजाब केवल पहनावे का नाम नहीं, बल्कि एक महिला की धार्मिक आस्था, आत्मसम्मान और सामाजिक पहचान से जुड़ा विषय है। इस्लामी दृष्टिकोण में हिजाब का उद्देश्य महिला को समाज से अलग करना नहीं, बल्कि उसकी मानवीय गरिमा, मानसिक शांति और सामाजिक मर्यादा की रक्षा करना है। इसलिए हिजाब को केवल कपड़े के रूप में देखना इसके व्यापक दर्शन को सीमित कर देना है।
आज की बदलती दुनिया में महिलाओं के सामने फैशन, सोशल मीडिया और सामाजिक दबाव के अनेक प्रभाव मौजूद हैं। ऐसे माहौल में हिजाब का पालन करना केवल एक धार्मिक दायित्व निभाना नहीं, बल्कि अपनी पसंद, विश्वास और पहचान के प्रति जागरूक रहने का भी प्रतीक हो सकता है।
महिला की असली पहचान केवल उसके बाहरी रूप से निर्धारित नहीं होती। उसकी शिक्षा, प्रतिभा, चरित्र, जिम्मेदारी, परिवार और समाज के प्रति उसकी भूमिका भी उसकी पहचान का हिस्सा हैं। इसलिए हिजाब करने वाली महिला को केवल पर्दे की पाबंदी के संदर्भ में नहीं, बल्कि एक शिक्षित, आत्मविश्वासी, सक्रिय और प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करना आवश्यक है।
नई पीढ़ी के सामने सोशल मीडिया का प्रभाव बहुत व्यापक है। इंस्टाग्राम, वीडियो प्लेटफॉर्म और दूसरे डिजिटल माध्यम लगातार यह तय करने की कोशिश करते हैं कि सुंदरता, सफलता और आधुनिकता कैसी दिखाई देनी चाहिए। ऐसे माहौल में महिलाओं के लिए यह समझना जरूरी है कि हर लोकप्रिय फैशन उनके लिए आवश्यक या उपयुक्त नहीं होता। अपनी पसंद का आधार केवल सोशल मीडिया की लोकप्रियता नहीं, बल्कि अपनी सोच, मूल्यों और व्यक्तिगत विश्वास को बनाना चाहिए।
हिजाब के साथ सफलता संभव है
हिजाब को सफलता में बाधा के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है। आज समाज में ऐसी महिलाएं मौजूद हैं जो हिजाब के साथ शिक्षा, शोध, चिकित्सा, कला, खेल, अध्यापन और विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। ऐसी महिलाओं की उपलब्धियों को सामने लाना जरूरी है, ताकि नई पीढ़ी को यह संदेश मिले कि हिजाब और सफलता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
इसी तरह सफल गृहिणियों, माताओं और परिवार को संभालने वाली महिलाओं के योगदान को भी कम नहीं आंका जाना चाहिए। परिवार का निर्माण और बच्चों की अच्छी परवरिश समाज के भविष्य को तैयार करने का महत्वपूर्ण कार्य है। एक मां अपने बच्चों के चरित्र, सोच और जीवन-मूल्यों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
मीडिया की जिम्मेदारी
महिलाओं के बारे में समाज की सोच बनाने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि फिल्मों, धारावाहिकों और सोशल मीडिया में सफलता को केवल बाहरी सुंदरता, महंगे कपड़ों और लोकप्रिय जीवनशैली से जोड़कर दिखाया जाएगा, तो युवा पीढ़ी पर उसका प्रभाव पड़ेगा।
इसके विपरीत यदि मीडिया ऐसी महिलाओं की वास्तविक कहानियां सामने लाए जो हिजाब के साथ अपनी शिक्षा पूरी कर रही हैं, वैज्ञानिक और सामाजिक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर रही हैं, परिवार संभाल रही हैं और समाज की सेवा कर रही हैं, तो यह एक अलग और सकारात्मक आदर्श प्रस्तुत कर सकता है।
हमें ऐसी महिलाओं की कहानियां सुनने और सुनाने की जरूरत है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने मूल्यों को नहीं छोड़ा। उनकी उपलब्धियां दूसरी महिलाओं और लड़कियों के लिए प्रेरणा बन सकती हैं।
हिजाब और आत्मविश्वास
हिजाब का पालन केवल दूसरों के दबाव के कारण नहीं होना चाहिए। धार्मिक दायित्व तभी अधिक अर्थपूर्ण बनता है जब उसे समझ और विश्वास के साथ अपनाया जाए। इसलिए महिलाओं और विशेष रूप से युवा लड़कियों के साथ हिजाब के विषय पर केवल आदेश या आलोचना की भाषा में बात करने के बजाय संवाद, शिक्षा और तर्क के माध्यम से बात करना आवश्यक है।
उन्हें यह समझने का अवसर दिया जाना चाहिए कि हिजाब का धार्मिक दर्शन क्या है, इस्लाम महिला की गरिमा को किस प्रकार देखता है और एक मुस्लिम महिला अपनी धार्मिक पहचान के साथ आधुनिक शिक्षा और सामाजिक जीवन में किस तरह आगे बढ़ सकती है।
समाज का रवैया भी महत्वपूर्ण है
हिजाब करने वाली महिला को सम्मान देना केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। किसी महिला के पहनावे के आधार पर उसका मजाक उड़ाना, उसे कमतर समझना या उसके चरित्र पर टिप्पणी करना उचित नहीं है। इसी तरह हिजाब करने वाली महिलाओं को भी दूसरे लोगों के प्रति सम्मान, अच्छे व्यवहार और सहनशीलता का प्रदर्शन करना चाहिए।
एक स्वस्थ समाज वह है जहां धार्मिक पहचान और व्यक्तिगत गरिमा दोनों का सम्मान किया जाए।
महिलाओं के लिए संदेश
आज की महिला के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल यह तय करना नहीं है कि वह क्या पहने, बल्कि यह तय करना भी है कि उसकी पहचान और जीवन के निर्णय कौन तय करेगा। सोशल मीडिया, फैशन और समाज की बदलती धारणाएं लगातार हमारी पसंद को प्रभावित करती हैं। ऐसे में अपनी सोच और मूल्यों को समझना आवश्यक है।
हिजाब यदि विश्वास और समझ के साथ अपनाया जाए तो वह केवल बाहरी वस्त्र नहीं रहता, बल्कि महिला की धार्मिक पहचान और आत्मसम्मान का हिस्सा बन जाता है। साथ ही हिजाब करने वाली महिला के लिए शिक्षा, आत्मनिर्भरता, अच्छे चरित्र, सामाजिक जिम्मेदारी और सफलता के रास्ते खुले रहते हैं।
इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हिजाब को केवल एक कपड़े की बहस तक सीमित न किया जाए। इसे महिला की गरिमा, धार्मिक पहचान, आत्मविश्वास और सामाजिक भूमिका के व्यापक संदर्भ में समझा जाए। समाज और मीडिया मिलकर ऐसी महिलाओं को सामने लाएं जो अपने विश्वास के साथ शिक्षा, परिवार और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सकारात्मक योगदान दे रही हैं।
क्योंकि जब एक महिला अपनी पहचान को समझते हुए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ती है, तो उसका प्रभाव केवल उसके जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता है।













