हज़रत आयतुल्ला बशीर हुसैन नजफ़ी के वुकला का सालाना इज्तिमा

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हज़रत आयतुल्ला बशीर हुसैन नजफ़ी के वुकला का सालाना इज्तिमा

नजफ़ अशरफ़; मरकज़ी दफ़्तर हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा अल्हाज हाफ़िज़ बशीर हुसैन नजफ़ी के शोबए वुकला व मोअतमेदीन (इराक़) ने नजफ़े अशरफ़ में मरजए आली क़द्र दाम ज़िल्लुहुल वारिफ़ के फ़र्ज़ंद और मरकज़ी दफ़्तर के मुदीर मोहतरम श़ेख़ अली नजफ़ी दाम इज़्ज़ुहू की सदारत में वुकला व मोअतमेदीन की बारहवीं सालाना कान्फ़्रेंस “अहले बैत अःस.के मनहज के मुताबिक़ हम शऊर की आबीआरी करते हैं, ताकि उसे चैलेंजेज़ का मुक़ाबला करने और मुस्तक़बिल की तामीर का मुहरीक बनाया जा सके” के उनवान के तहत मुनअक़िद की, यह कान्फ़्रेंस हरमे हज़रत-ए-इमाम अली अःस.के सहने हज़रत फ़ातिमा ज़हरा अःसः में मुनअक़िद हुई।

इस कान्फ़्रेंस में मरजए आली क़द्र दाम ज़िल्लुहुल वारिफ़ के मुतअद्दिद वुकला और मोतमेदीन ने शिरकत की, जो इराक़ के मुख़्तलिफ़ शहरों और सूबों से तशरीफ़ लाए थे जिनमें शुमाल में मुसल से लेकर जुनूब में बसरा तक के नुमाइंदगान शामिल थे।

इस कान्फ़्रेंस का इनइक़ाद मरकज़ी दफ़्तर और वुकला व मोअतमेदीन के दरमियान मुसलसल राबिते व बाहमी तआवुन के दायरे-ए-कार को मज़ीद फ़आल बनाने और इराक़ की मौजूदा सूरत-ए-हाल से मुतअल्लिक़ इल्मी, तब्लीग़ी और समाजी उमूर का जायज़ा लेने और मुत्तफ़िक़ा लाएहा-ए-अमल पर मुस्तक़बिल में अमल करना है।

इसके अलावा, सिद्दीक़ए ताहिरा हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (अःसः) की शहादत (दूसरी रिवायत के मुताबिक़ 13 जमादीउल-अव्वल) की मुनासबत पर मरजए आली क़द्र दाम ज़िल्लुहुल वारिफ़ की मौजूदगी में सालाना जुलूसे अज़ाए फ़ातिमिया के इंतिज़ामात की तैयारी भी इस कान्फ़्रेंस के इनइक़ाद के मक़ासिद में शामिल थी। ये जुलूस अहले बैत (अःसः) से वफ़ादारी और उनके बाबरकत मनहज पर साबित-क़दमी के इज़हार के तौर पर निकाला जाता है।

कान्फ़्रेंस की अहम बातें;मरकज़ी दफ़्तर से राबिता: मरकज़ी दफ़्तर, वुकला और मुबल्लिग़ीन के दरमियान बराहे-रास्त मुलाक़ात, मुसलसल मुशावरत और मोअस्सिर राबिते की अहमियत पर ज़ोर दिया गया, ताकि मुश्तरका नुक़्तए-नज़र और बेहतर हमआहंगी पैदा हो।

ज़माने के हालात का इद्राक: इमाम-ए-सादिक़ (अःसः)के फ़रमान «العالم بزمانه لا تهجم عليه اللوابس» की रोशनी में मौजूदा हालात, फ़िक्री व सक़ाफ़ती तब्दीलियों और मुआशरती ज़रूरतों को समझने पर ताकीद की गई।

वुकला व मोअतमेदीन की ज़िम्मेदारी: उन्हें सिर्फ़ इंतिज़ामी नुमाइंदे नहीं बल्कि मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में मरजइयत की दीनी व तब्लीग़ी ज़िम्मेदारियों का बराहे-रास्त नुमाइंदा क़रार देते हुए, दीनी शऊर, अख़लाक़ी अक़दार और मुआशरती आगाही के फ़रोग़ की ज़िम्मेदारी पर ज़ोर दिया गया।

इलाक़ाई व मुल्की हालात: ख़ित्ते की तेज़-रफ़्तार जुग़राफ़ियाई व सियासी तब्दीलियों, मौजूदा दाख़िली हालात और मुल्क की सियासी व इक़तेसादी सूरत-ए-हाल का जायज़ा लिया गया।

नौजवान नस्ल पर तवज्जोह: डिजिटल मीडिया और तेज़-रफ़्तार सक़ाफ़ती तब्दीलियों के तनाज़ुर में दीनी ख़िताब के जदीद और मोअस्सिर तरीक़ों को अपनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया, जबकि नौजवानों की तर्बियत और रहनुमाई में उलमा व मुबल्लिग़ीन के फ़आल किरदार को अहम क़रार दिया गया।

हुसैनी मवाकिब व हैआत: नौजवानों की वसीअ तवानाइयों को हुसैनी मवाकिब व हैआत के ज़रिए दीनी व अक़ाइदी तर्बियत और अहले बैत (अःसः) से वाबस्तगी के लिए मोअस्सिर तौर पर इस्तेमाल करने पर ज़ोर दिया गया।

अशाइर से राबिता: इराक़ी क़बाइल और उनके सरबराहान के साथ मुसलसल बराहे-रास्त राबिते के ज़रिए शरई मफ़ाहीम को मज़बूत करने और दीन से मुतसादिम रसूमात के मुक़ाबले की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया।

ख़ानदान और ख़वातीन: ख़ानदान को दरपेश फ़िक्री व इबलाग़ी चैलेंजेज़ पर गुफ़्तगू करते हुए मुस्लिम ख़वातीन के लिए बावक़ार, तर्बियती और रहनुमाई पर मबनी दीनी ख़िताब को फ़रोग़ देने पर ज़ोर दिया गया।

हौज़वी निज़ाम की तंज़ीम: हौज़वी व इल्मी काम को मज़ीद मुनज़्ज़म करने और मुख़्तलिफ़ सूबों में इल्मी मदारिस व हौज़ात की हिमायत जारी रखने पर ताकीद की गई।

फ़िक्री चैलेंजेज़ का मुक़ाबला: शैख़ आदिल अज़्ज़रक़ानी दाम इज़्ज़ुहू ने वाज़ेह किया कि मौजूदा चैलेंजेज़ का मुक़ाबला फ़िक्र, इल्म, शऊर, सब्र, साबित-क़दमी और हिकमत के ज़रिए किया जाए; आलिमे दीन सिर्फ़ मालूमात पहुँचाने वाला नहीं बल्कि शऊर पैदा करने वाला, अक़दार का मुहाफ़िज़ और हालात को समझने वाला होना चाहिए।

फ़िक्री इनहिराफ़ और तशकीक: फ़िक्री इनहिराफ़ का मुक़ाबला गहरे और मज़बूत फ़िक्र की तश्कील से, जबकि शुकूक व शुब्हात का मुक़ाबला सवाल से ख़ौफ़ के बजाय इल्मी जवाब देने की सलाहियत से करने पर ज़ोर दिया गया।

जुलूसे अज़ाए फ़ातिमिया की तैयारी: हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (अःसः) की शहादत, (दूसरी रिवायत के मुताबिक़) सालाना जुलूसे अज़ाए फ़ातिमिया की तैयारी और भरपूर शिरकत पर ख़ुसूसी तवज्जोह दी गई। ये जुलूस हर साल मरकज़ी दफ़्तर से अमीरुल-मोमिनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अःसः) के रौज़ए अक़्दस तक निकाला जाता है।

इख़्तितामी ताकीद: तब्लीग़ी, इल्मी और समाजी सरगर्मियों को जारी रखने, मुआशरे के मुख़्तलिफ़ तबक़ात से राबिता मज़बूत करने, दीनी मुनासबतों के लिए अमली तैयारी और मोमिनीन व इराक़ी मुआशरे की ख़िदमत में वुकला व मोअतमेदीन के किरदार को मज़ीद फ़आल बनाने पर ज़ोर दिया गया।

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