आयतुल्लाह सैयद काज़िम नूरमुफीदी ने कहा कि अल्लाह तआला ने जिन लोगों को अधिक क्षमताएं, संसाधन और सुविधाएं प्रदान की हैं, उनकी जिम्मेदारी भी अधिक है। इन नेमतों का वास्तविक शुक्र यह है कि उन्हें अल्लाह के बंदों की सेवा और लोगों की परेशानियां दूर करने के लिए इस्तेमाल किया जाए।
आयतुल्लाह सैयद काज़िम नूरमुफीदी, इमदाद कमेटी के अधिकारी, समाजसेवी और स्वस्थ हो चुके मरीजों ने भाग लिया।
आयतुल्लाह नूरमुफीदी ने क़ुरआन की शिक्षाओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि इंसानों को अल्लाह तआला की नेमतें अलग-अलग रूप में प्राप्त होती हैं। मोमिन का रवैया यह होना चाहिए कि वह अपनी सभी नेमतों को अल्लाह की ओर से मिली हुई देन समझे और उनका शुक्र अदा करे।
उन्होंने कहा कि अधिक क्षमता और संसाधन मिलना अधिक जिम्मेदारी का भी संकेत है। अल्लाह तआला ने कुछ लोगों को दूसरों की तुलना में अधिक सुविधाएं प्रदान की हैं, इसलिए उनका कर्तव्य है कि वे अपनी क्षमताओं और संसाधनों को दूसरों की सहायता के लिए इस्तेमाल करें।
वली-ए-फ़क़ीह के प्रतिनिधि ने इंसाफ़ और इन्फ़ाक़ के महत्व को बताते हुए कहा कि अल्लाह की राह में दूसरों की मदद करना केवल जरूरतमंद के लिए लाभदायक नहीं है, बल्कि मदद करने वाले के व्यक्तित्व और जीवन पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। जो व्यक्ति अल्लाह की प्रसन्नता के लिए किसी जरूरतमंद का हाथ थामता है, उसे इस नेक काम के प्रभाव और बरकतें अपने जीवन में भी प्राप्त होती हैं।
आयतुल्लाह नूरमुफीदी ने कैंसर के मरीजों के इलाज में उम्मीद और हौसले के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि अल्लाह से आध्यात्मिक संबंध, दुआ और उसकी रहमत से उम्मीद इंसान के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मरीजों का मजबूत हौसला और उम्मीद भी स्वस्थ होने के सफर में मददगार साबित होती है।
उन्होंने स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले समाजसेवियों और दानदाताओं का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि यह अल्लाह का शुक्र है कि उसने हमें अपने बंदों, विशेष रूप से बीमारों और जरूरतमंदों की सेवा करने का अवसर दिया।
उन्होंने गुलिस्तान में कैंसर के लिए विशेष अस्पताल की योजना का उल्लेख करते हुए उम्मीद जताई कि यह परियोजना जल्द पूरी होगी और मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी।
अंत में उन्होंने कहा कि हमें अल्लाह से दुआ करनी चाहिए कि वह हमारे दिलों में विस्तार पैदा करे, ताकि हम केवल अपनी जरूरतों तक सीमित न रहें, बल्कि दूसरों के दर्द और परेशानियों को भी समझें और उन्हें दूर करने के लिए व्यावहारिक कदम उठाएं।













