एक ज़िम्मेदार अलिमेदीन समाज में गहरा बदलाव ला सकता है।

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एक ज़िम्मेदार अलिमेदीन समाज में गहरा बदलाव ला सकता है।

आयतुल्लाह मुस्तफा अशरफी शाहरूदी ने कहा कि एक प्रतिबद्ध और ज़िम्मेदार धर्मगुरु अपने व्यावहारिक आचरण और नैतिकता के माध्यम से समाज में गहरा बदलाव ला सकता है। उन्होंने आत्ममुग्धता और अहंकार को इंसान की आध्यात्मिक तरक्की में बड़ी रुकावट बताते हुए कहा कि इंसान को अपनी इबादत, ज्ञान और नेकियों पर घमंड नहीं करना चाहिए।

 आयतुल्लाह मुस्तफा अशरफी शाहरूदी ने कहा कि एक प्रतिबद्ध और जिम्मेदार आलिमदीन अपने व्यावहारिक चरित्र और अच्छे आचरण से समाज में गहरा परिवर्तन पैदा कर सकता है। उन्होंने आत्ममुग्धता और अहंकार को आध्यात्मिक विकास की बड़ी बाधा बताया है।

मशहद के इस धर्मगुरु ने अपने दर्स-ए-खारिज-ए-फ़िक़्ह में कहा कि अगर कोई जिम्मेदार आलिम किसी शहर, गांव या समाज में मौजूद हो और दूसरों को नसीहत करने से पहले खुद धार्मिक आदेशों पर अमल करे, तो उसका चरित्र लोगों की तरबीयत और सुधार पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। उन्होंने कहा कि इतिहास में फुकहा और उलेमा ने अपने व्यावहारिक आचरण के माध्यम से समाज में महत्वपूर्ण बदलाव पैदा किए हैं।

आयतुल्लाह अशरफी शाहरूदी ने आत्ममुग्धता के नुकसान बताते हुए कहा कि इंसान को थोड़े से ज्ञान या इबादत की वजह से खुद को दूसरों से बेहतर नहीं समझना चाहिए। कभी-कभी इंसान ज्यादा इबादत और नेक कामों के कारण खुद को महत्वपूर्ण समझने लगता है, जबकि यही स्थिति उसे आध्यात्मिक विकास से दूर कर सकती है।

उन्होंने एक रिवायत का हवाला देते हुए कहा कि कभी इंसान बहुत अधिक इबादत करने की कोशिश करता है, लेकिन अल्लाह उसे आराम और नींद देता है, ताकि वह अपने कर्मों पर घमंड न करने लगे। क्योंकि इबादत पर अहंकार इंसान को उसके अपने ही नेक कामों के फितने में मुबतला कर सकता है।

उन्होंने आगे कहा कि आत्ममुग्धता का इलाज यह है कि इंसान अपनी वास्तविकता, अपनी शुरुआत और अपने अंजाम पर विचार करे और समझे कि उसके पास मौजूद ज्ञान, समझ और क्षमताएं अल्लाह की वायज़ हैं। जब इंसान अल्लाह की अज़मत और अपनी कमज़ोरी को समझता है, तो उसके भीतर अहंकार कम होने लगता है।

आयतुल्लाह अशरफी शाहरूदी ने कहा कि ईर्ष्या और आत्ममुग्धता जैसी भावनाएं इंसान के भीतर पैदा हो सकती हैं, लेकिन रिवायतों में इनके इलाज के तरीके भी बताए गए हैं। इंसान को अपनी इस्लाह के लिए लगातार अपने नफ्स का जायजा लेते रहना चाहिए और अल्लाह से मदद मांगनी चाहिए।

अंत में उन्होंने आत्ममुग्धता के शरई हुक्म के संबंध में अपने उस्ताद आयतुल्लाह ख़ूई की चर्चा का उल्लेख करते हुए कहा कि अगर आत्ममुग्धता अमल के बाद पैदा हो तो आम तौर पर उससे वह अमल बातिल नहीं होता, जबकि अमल के दौरान पैदा होने वाली आत्ममुग्धता के बारे में उलमा के बीच अलग-अलग राय पाई जाती है।

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