परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम; दुश्मन के असली मकसद को छिपाने के बहाने हैं

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परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम; दुश्मन के असली मकसद को छिपाने के बहाने हैं

 हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद अब्दुर्रज्जाक पीरदेहकान ने कहा कि परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम के मुद्दे दुश्मन के असली मकसद को छिपाने के बहाने मात्र हैं। वास्तव में दुश्मन इस्लामी संदेश और स्वतंत्रता की विचारधारा के दुनिया भर में फैलने से चिंतित है।

,हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद अब्दुर्रज्जाक पीरदेहकान ने कहा कि परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम के मुद्दे दुश्मन के असली मकसद को छिपाने के बहाने मात्र हैं। वास्तव में दुश्मन इस्लामी संदेश और स्वतंत्रता की विचारधारा के दुनिया भर में फैलने से चिंतित है।

आज इस्लामी क्रांति, इमाम खुमैनी (रह.) और शहीद इमाम की विचारधारा दुनिया के विभिन्न हिस्सों में प्रभाव डाल रही है, यही कारण है कि दुश्मन प्रतिक्रिया दे रहे हैं। वे पवित्र हज़रत मासूमा (स.ल.) के हरम में आयोजित फातिमी तिलावत की सभा को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने सूरह अहज़ाब की आयतों की व्याख्या करते हुए वर्तमान परिस्थितियों और इस्लाम के शुरुआती दौर में हुई जंग-ए-अहज़ाब के बीच समानताओं पर प्रकाश डाला।

उन्होंने सूरह अहज़ाब की आयत 9 से 21 का हवाला देते हुए कहा कि जंग-ए-अहज़ाब की प्रमुख विशेषता यह थी कि पैगंबर-ए-इस्लाम (स.) के दुश्मन एकजुट होकर मुसलमानों के खिलाफ मैदान में उतर आए थे। बनी नज़ीर के यहूदियों ने मक्का के मुशरिकों और दूसरे कबीलों को मुसलमानों के विरुद्ध एकजुट किया था।

आज भी ईरान के विरोधी आपसी मतभेदों के बावजूद ईरानी जनता के खिलाफ एक मोर्चे पर खड़े हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह उस समय अम्र बिन अब्दे-वुद दुश्मन की सैन्य शक्ति और आतंक का प्रतीक था, उसी तरह आज दुश्मन अपने युद्धपोतों और आधुनिक सैन्य उपकरणों के जरिए ईरानी जनता में भय पैदा करना चाहता है।

लेकिन जिस प्रकार हज़रत अली (अ.स.) ने अम्र बिन अब्दे-वुद को पराजित किया था, उसी प्रकार उनके विचारों पर चलने वाले लोगों ने भी अमेरिका की खोखली ताकत के सामने दृढ़ता दिखाई है।

उन्होंने सूरह अहज़ाब की आयत 11 से 13 की व्याख्या करते हुए कहा कि जंग-ए-अहज़ाब ईमान वालों के लिए कठिन परीक्षा और सच्चे तथा कमज़ोर ईमान वालों के बीच अंतर स्पष्ट करने का समय था। अल्लाह ने इन आयतों में मोमिनों पर आने वाली कठिनाइयों और उनकी परीक्षा का उल्लेख किया है, क्योंकि केवल दावा करने से ईमान साबित नहीं होता, बल्कि कठिन परिस्थितियों में इंसान की वास्तविकता सामने आती है।उस समय तीन तरह के लोग सामने आए थे

मुनाफिक, जो अपने व्यवहार और बातों से दुश्मन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाते थे; कमज़ोर ईमान वाले, जो दबाव के सामने पीछे हट जाते थे; और दृढ़ विश्वास वाले मोमिन, जो अपने वादे और ईमान पर कायम रहते थे। उन्होंने कहा कि आज भी ऐसे लोगों से सावधान रहने की जरूरत है, जो दुश्मन की भाषा दोहराकर समाज में निराशा और मायूसी फैलाते हैं तथा लोगों को अपने मूल्यों और विश्वासों से पीछे हटने की सलाह देते हैं।

सूरह अहज़ाब की आयत 21
«لَقَدْ کانَ لَکُمْ فی رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ»
का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पैगंबर-ए-इस्लाम (स.ल.) का जीवन सभी युगों के लिए बेहतरीन आदर्श है। जंग-ए-अहज़ाब में रसूले अकरम (स.ल.) ने अल्लाह पर भरोसा करते हुए दुश्मनों के विशाल गठबंधन का मुकाबला किया।

कुरआन ने उनकी दृढ़ता और अल्लाह पर भरोसे को मुसलमानों के लिए आदर्श बताया है। उन्होंने आगे कहा कि ईरानी जनता को बद्र की जंग और इस्लाम के इतिहास में अल्लाह की मदद के साथ-साथ आठ वर्षीय ईरान-इराक युद्ध के अनुभवों को भी याद रखना चाहिए।

कठिन परिस्थितियों में ईमान, एकता और धैर्य बनाए रखना जरूरी है। वास्तविक शक्ति अल्लाह के हाथ में है और सत्य के मार्ग पर सफलता उसी के भरोसे तथा दृढ़ता से प्राप्त होती है।

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