बहरैन के 14 फरवरी गठबंधन के राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख इब्राहिम अलअरादी ने यमन के रास ईसा बंदरगाह और नागरिक सुविधाओं पर सऊदी हमलों की निंदा की है। उन्होंने इन हमलों को युद्ध अपराध बताते हुए आरोप लगाया कि सऊदी अरब, मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में, क्षेत्र में इज़राइली एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम कर रहा है।
सऊदी अरब द्वारा यमन के रास ईसा बंदरगाह और आम नागरिकों के जीवन से जुड़ी सुविधाओं को निशाना बनाए जाने के बाद इब्राहिम अलअरादी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के रवैये की आलोचना की। उन्होंने कहा कि इन हमलों में निर्दोष नागरिकों की जान गई है, लेकिन उन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया, जिनकी जिम्मेदारी नागरिकों की सुरक्षा और मानवाधिकारों की रक्षा करना है।
अलअरादी ने आरोप लगाया कि सऊदी अरब की कार्रवाई केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यमन की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक एकता को भी निशाना बनाया जा रहा है। उनके अनुसार, सांप्रदायिक और राजनीतिक उकसावे के जरिए यमन की जनता के बीच मतभेद पैदा करने, भाड़े के लड़ाकों को संगठित करने तथा नागरिकों और महत्वपूर्ण संसाधनों पर हमले करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इन गतिविधियों को क्षेत्र में इज़राइली एजेंडे को लागू करने की व्यापक योजना से जोड़ा।
उन्होंने कहा कि यमन की जनता बमबारी और घेराबंदी के बावजूद अपने रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं है। वह अत्याचार का विरोध जारी रखे हुए है और अपनी घेराबंदी समाप्त करने की मांग कर रही है। अलअरादी ने सवाल उठाया कि क्या सऊदी नेतृत्व यह समझता है कि हत्याओं और नरसंहारों के जरिए यमनियों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया जा सकता है? उन्होंने कहा कि अब तक के हालात ने स्पष्ट कर दिया है कि यमन की जनता अपने रुख पर कायम है।
अलअरादी ने रास ईसा बंदरगाह पर हमले को ग़ज़ा में नेतन्याहू की नीतियों की पुनरावृत्ति बताया। उनके अनुसार, इन कार्रवाइयों का उद्देश्य उन सुविधाओं को नष्ट करना है, जो आम लोगों के जीवन से जुड़ी हैं। उन्होंने यूरोपीय संघ, नाटो और अमेरिका की चुप्पी की आलोचना करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमलों को रोकने के लिए कोई गंभीर पहल दिखाई नहीं दी। उन्होंने वर्ष 2011 में बहरीन में सऊदी सैनिकों के प्रवेश का भी उल्लेख किया और कहा कि यमन में भी उसी तरह की नीतियाँ अपनाई जा रही हैं।
उन्होंने अल-मसीरा टीवी चैनल पर प्रसारित पीड़ितों की तस्वीरों का हवाला देते हुए कहा कि घरों पर हमलों में दर्जनों लोग मारे गए, जिनमें बच्चे भी शामिल थे। अलअरादी का दावा है कि हमलों का समय और उनकी प्रकृति क्षेत्र में इज़राइली एजेंडे को लागू करने की योजना से उनके संबंध को दर्शाती है।
उन्होंने यह भी कहा कि रास ईसा बंदरगाह को निशाना बनाए जाने से संघर्ष का नया चरण शुरू हो सकता है। उनके अनुसार, सना के पास ऐसी सैन्य क्षमताएँ और विकल्प मौजूद हैं, जिन्हें उसने अब तक सामने नहीं लाया है। उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण संसाधनों पर हमले उस समय किए गए, जब विरोधी पक्ष अपने उद्देश्यों को हासिल करने में असफल रहा था।
अलअरादी ने यमन के भीतर अशांति फैलाने के लिए भाड़े के लड़ाकों के इस्तेमाल का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि नागरिकों के अपहरण और तइज़ सहित अन्य क्षेत्रों में सुरक्षित घरों पर हमले जैसी घटनाओं को किसी सैन्य उद्देश्य के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
अपने बयान में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर सऊदी धन और राजनीतिक दबाव से प्रभावित होने का आरोप भी लगाया। उनके अनुसार, आर्थिक सहायता रोकने की धमकियों, रिश्वत और राजनीतिक ब्लैकमेल के कारण कई संस्थाएँ यमन के खिलाफ अपराधों पर खुलकर आवाज़ नहीं उठा रही हैं। उन्होंने अल-अज़हर सहित कुछ धार्मिक संस्थाओं और विद्वानों का भी उल्लेख किया।
अलअरादी ने ब्रिटेन में रहने वाले यमनियों से लंदन स्थित सऊदी दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन आयोजित करने की अपील की। उन्होंने दुनिया के अन्य देशों में रहने वाले यमनियों और स्वतंत्रता समर्थकों से भी आग्रह किया कि वे सऊदी दूतावासों के सामने प्रदर्शन करें, हमलों का दस्तावेज़ीकरण करें और तस्वीरों तथा मीडिया के माध्यम से इन घटनाओं को अंतरराष्ट्रीय जनमत तक पहुँचाएँ।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता के लिए अमेरिकी प्रभाव को जिम्मेदार ठहराया और आरोप लगाया कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय संयुक्त राष्ट्र के मंचों तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कामकाज को प्रभावित करता है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ देश अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए विभिन्न पदों पर अपने उम्मीदवारों को आगे कर रहे हैं।
अलअरादी ने अपने बयान के अंत में कहा कि ईमान केवल नमाज़ और रोज़े तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाना और पीड़ितों की सहायता करना भी शामिल है। उन्होंने यमन, बहरीन, लेबनान और ग़ज़ा में जारी घटनाओं को व्यापक क्षेत्रीय स्थिति से जोड़ते हुए कहा कि इन कार्रवाइयों का उद्देश्य राष्ट्रों की इच्छाशक्ति को कमजोर करना है। उन्होंने यमन की जनता के प्रतिरोध और बलिदान को स्वतंत्रता की राह का महत्वपूर्ण कदम बताते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय तथा मानवाधिकार संगठनों से यमन के खिलाफ हमलों पर गंभीर रुख अपनाने की अपील की।













