हाजी वा ज़ाएरीन और मुल्क का फायदा।

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हाजी वा ज़ाएरीन और मुल्क का फायदा।

 हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी ने कहां,मक्के, मदीने या दीगर मुक़द्दस मक़ामात का सफ़र करने वाले ज़ायर का सफ़र सिर्फ़ एक रुहानी इबादत ही नहीं है, बल्कि इस का एक अहम मआशी आर्थिकपहलू भी होता है। जब लाखों ज़ाएरीन हर साल सफ़र करते हैं, तो वे अपने साथ काफ़ी Foreign Exchange साथ ले जाते हैं। आमतौर पर लोग अपने देश की करंसी को अमरीकी डॉलर ($) में बदलते हैं और फिर दूसरे देशों में जाकर वहाँ की स्थानीय करंसी जैसे रियाल में तब्दील कराते हैं।​अगर हाजी वा ज़ाएरीन डॉलर के बजाय सीधे अपने देश की करंसी ले जाएँ या सीधे करंसी (सऊदी रियाल) में लेनदेन का तरीक़ा अपनाएँ, तो इससे अपने देश की अर्थव्यवस्था मईशत को सीधा फ़ायदा पहुँच सकते है।

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी ने कहां,मक्के, मदीने या दीगर मुक़द्दस मक़ामात का सफ़र करने वाले ज़ायर का सफ़र सिर्फ़ एक रुहानी इबादत ही नहीं है, बल्कि इस का एक अहम मआशी आर्थिकपहलू भी होता है। जब लाखों ज़ाएरीन हर साल सफ़र करते हैं, तो वे अपने साथ काफ़ी  Foreign Exchange  साथ ले जाते हैं। आमतौर पर लोग अपने देश की करंसी को अमरीकी डॉलर ($) में बदलते हैं और फिर दूसरे देशों में जाकर वहाँ की स्थानीय करंसी जैसे रियाल में तब्दील कराते हैं।

​अगर हाजी वा ज़ाएरीन डॉलर के बजाय सीधे अपने देश की करंसी ले जाएँ या सीधे  करंसी (सऊदी रियाल) में लेनदेन का तरीक़ा अपनाएँ, तो इससे अपने देश की अर्थव्यवस्था मईशत को सीधा फ़ायदा पहुँच सकते है।

1. डॉलर पर इन्हेसार वा डिपेंड से मुल्की मईशत पर उसका असर:

​जब किसी देश के मुसाफिर फारेन करन्सी सफ़र के लिए डालर खरीदते हैं, तो देश के फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व पर दबाव पड़ता है।
​डबल कन्वर्जन का नुक़्सान पहले अपनी मक़ामी करंसी (जैसे भारतीय रुपया या पाकिस्तानी रुपया) से अमरीकी डॉलर खरीदना, और फिर उस डॉलर को सऊदी रियाल या दूसरी करंसी में बदलने से दो बार कन्वर्जन चार्ज
Exchange Fee देना पड़ता है, जिससे ज़ाएरीन को मआशी नुक़सान होता है।​रुपये/मक़ामी करंसी की क़द्र में कमी।
जब बाज़ार में अमरीकी डॉलर की माँग बढ़ती है, तो मक़ामी करंसी की क़ीमत गिरती है।

2. अपनी करंसी ले जाने या 'Local Currency Settlement Mechanism' के फायदे
​अगर ज़ायर अपने देश की करंसी ले जाते हैं या दोनों देश आपस में स्थानीय करंसी में तेजारत/लेनदेन का समझौता Bilateral Currency Swap / Local Currency Settlement करते हैं, तो इसके दरजे ज़ैल फाएदे होते हैं

पहलूअमरीकी डॉलर का इस्तेमालअपनी करंसी/डायरेक्ट रियाल का इस्तेमाल कन्वर्जन फीस दो बार पहले रूपए से डॉलर लेना पड़ेगा फिर डालर से रियाल जिस से देश के ख़जाने पर असर पड़ता है औरफॉरेन रिजर्व कम होता है और अपने मुल्क का फॉरेन रिजर्व समहफ़ूज़ रहता है अपने मुल्क की करंसी की माँग और साख बढ़ती है हाजी/ज़ायर को फ़ायदा बैंक और एक्सचेंज कमीशन में पैसा कम खर्च होगा और लेनदेन आसान हो जाएगी

3. इस बात पर सुबूत और ताज़ा तहक़ीक़
​हाल के बरसों में कई देशों की सरकारों और केंद्रीय बैंकों ने इस रूख़ पर बड़े ठोस कदम उठाए हैं।​सऊदी अरब और भारत का 'रुपया-रियाल' समझौता (Rupee-Riyal Trade & LCS
​सुबूत।भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सऊदी सेंट्रल बैंक (SAMA) के बीच मक़ामी करंसी में तेजारत और लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए बातचीत और फ्रेमवर्क तैयार किए गए हैं।
​फ़ायदा इससे हाजी और उमरह ज़ाएरीन को सीधे भारतीय रुपये या यूपीआई (UPI)  कार्ड्स के ज़रिए सऊदी अरब में अदाएगी करने की सहूलियत मिल रही है, जिससे डॉलर पर डिपेंड खत्म हो जाएगा

​सऊदी अरब में UPI और डिजिटल पेमेंट का आगाज़।​सुबूत NPCI International Payments Limited (NIPL) ने मिडल ईस्ट के बैंकों के साथ समझौते किए हैं ताकि भारतीय ज़ाएरीन बिना डॉलर खरीदे सीधे डिजिटल माध्यम से रुपये में भुगतान कर सकें।

दुनिया भर के देश (जैसे भारत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, मलेशिया) अब डॉलर के बजाय 'Local Currency Trade Settlement' को तरजीह दे रहे हैं। जब ज़ायर सीधे अपने देश की बैंकिंग प्रणाली का इस्तेमाल करते हैं, तो देश का पैसा देश के बैंकिंग नेटवर्क में ही रहता है।

​4. ज़ाएरीन अपने देश की तरक्की में कैसे योगदान दे सकते हैं?

गैर-कानूनी फॉरेन एक्सचेंज (जैसे हवाला) से बचें। हमेशा सरकारी बैंकों या उनके कार्ड्स का इस्तेमाल करें।​फालतू डॉलर कन्वर्जन से बचें
सिर्फ उतना ही फॉरेन एक्सचेंज लें जितनी ज़रूरत हो। अंतरराष्ट्रीय डेबिट/क्रेडिट कार्ड या फॉरेक्स कार्ड का इस्तेमाल करें जो सीधे मक़ामी करंसी को रियाल में बदलता है।

​अपने मुल्क के बैंकिंग सहूलतों को बढ़ावा दे
अपने देश के नेशनल बैंक्स द्वारा जारी 'हज कार्ड' या 'फॉरेक्स कार्ड' का इस्तेमाल करें, जिससे कन्वर्जन चार्ज का फायदा देश के बैंकों को मिले।
​ख़ुलासह यह कि ​हाजी और ज़ाएरीन का मकसद रुहानी और रूह को पाक करने वाला होता है।

लेकिन अगर वे सही माआशी समझदारी दिखाएँ और डॉलर के बजाय अपनी राष्ट्रीय करंसी या सीधे डिजिटल/फॉरेक्स माध्यमों का इस्तेमाल करें, तो इससे न सिर्फ उनके अपने पैसों की बचत होगी, बल्कि उनके मुल्क का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा और देश की अर्थव्यवस्था को सीधा फायदा पहुँचेगा।

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