बिन सलमान की छटपटाहट यमन की जीत को दर्शाती है।यमन

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बिन सलमान की छटपटाहट यमन की जीत को दर्शाती है।यमन

यमन में सऊदी अरब के ख़िलाफ़ “घेरे के बदले घेरा और escalation के बदले escalation” की रणनीति लगातार जारी है और पश्चिमी तट पर बड़ी जीत के साथ-साथ वहां के समीकरण भी यमन के पक्ष में बने हुए हैं।

,यमन में सऊदी अरब के ख़िलाफ़ “घेरे के बदले घेरा और escalation के बदले escalation” की रणनीति लगातार जारी है और पश्चिमी तट पर बड़ी जीत के साथ-साथ वहां के समीकरण भी यमन के पक्ष में बने हुए हैं।

इसी बीच यमन सरकार के उप सूचना मंत्री मुहम्मद मंसूर ने अपने हालिया बयान में कहा कि सऊदी युवराज मुहम्मद बिन सलमान की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ बातचीत, क़ाहिरा में उनकी प्रस्तावित गतिविधियां तथा अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर के साथ उनकी मुलाक़ात यह सभी घटनाएं यमन की जीत के महत्व और उसकी गहराई को उजागर करती हैं।

मुहम्मद मंसूर ने यमनी वेबसाइट अल-मसीरा से बातचीत में कहा कि यह जीत सैन्य, राजनीतिक, जनसमर्थन और मीडिया—सभी स्तरों पर एक रणनीतिक जीत है। युद्ध संबंधी मीडिया द्वारा जारी की गई तस्वीरें यमन की जीत की विशालता, उसके सामने मौजूद चुनौती और उस चुनौती पर हासिल की गई सफलता को दर्शाती हैं। साथ ही, उन्होंने कहा कि सऊदी-अमीराती परियोजना को हुए नुकसान का अनुमान दसियों अरब डॉलर तक पहुंचता है।

उन्होंने कहा कि पश्चिमी, ब्रिटिश और फ्रांसीसी मीडिया ने बहुत कम समय में इस बात पर चर्चा शुरू कर दी कि सऊदी अरब के नेतृत्व में किए गए सबसे बड़े सैन्य आक्रमण की परियोजना को यमन कैसे विफल करने में सफल रहा। इसी तरह इस्राईली शासन के राजनीतिक और मीडिया हलकों में मची व्यापक हलचल भी पश्चिमी तट की घटनाओं से लगे बड़े झटके को दर्शाती है।

इस यमनी अधिकारी ने जोर देकर कहा कि इसलिए जो कुछ हुआ, वह सऊदी, अमीराती, इस्राईली और अमेरिकी परियोजना के लिए अपने सभी नामों और विभिन्न गुटों के बावजूद सैन्य, राजनीतिक और जनमत के स्तर पर स्पष्ट पराजय थी। उन्होंने कहा कि, सऊदी अरब को कई राजनीतिक झटके लगे हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यमन में सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार करना है।

मुहम्मद मंसूर ने सऊदी अरब की मक्का समझौते को लेकर उम्मीदों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान भी इस संघर्ष में हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ है और पाकिस्तानी सेना इसमें शामिल नहीं होगी। कुल मिलाकर पाकिस्तान और तुर्की के रुख रियाद की मांगों के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने कहा कि इस बीच सऊदी अरब बिन सलमान की क़ाहिरा यात्रा के नतीजे का इंतजार कर रहा है, लेकिन मिस्र की सेना भी खुद को इस संघर्ष में शामिल नहीं करेगी।

मुहम्मद मंसूर ने कहा कि बिन सलमान की अचानक और पूर्व निर्धारित कार्यक्रम से बाहर काहिरा यात्रा का उद्देश्य मिस्र की आर्थिक स्थिति का फायदा उठाना है, लेकिन इस मामले में मिस्र की सेना का रुख निर्णायक होगा। जब अमेरिका यमन के साथ सीधे संघर्ष में उतरने से बच रहा है, तो आखिर कौन इस टकराव में सऊदी अरब का साथ देने के लिए आगे आएगा?

उन्होंने आगे कहा,रियाद हाथ-पैर मार रहा है, संघर्ष कर रहा है, रिश्वत दे रहा है और बच निकलने की कोशिश कर रहा है, जबकि सनआ चौबीसों घंटे सऊदी गतिविधियों पर नजर रख रही है। उन्होंने कहा कि इसी बीच इस्राईली शासन को एहसास हो गया है कि, सऊदी अरब मुश्किल में फंस चुका है और वह खुद भी यमन के साथ युद्ध में शामिल नहीं हो सकता, क्योंकि इसके गंभीर परिणाम होंगे।

इस यमनी अधिकारी ने कहा कि इस्राईल, सऊदी अरब को उसी तरह के सामान्यीकरण समझौतों की ओर धकेलना चाहता है, जैसे उसने संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के साथ किए हैं। उन्होंने कहा कि इस्राईल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस शासन के चुनावों से पहले सऊदी अरब के साथ सामान्यीकरण समझौते को अंतिम रूप देना चाहते हैं।

इस बीच, यमनी सशस्त्र बल सऊदी समर्थित लड़ाकों से मुक्त कराए गए पश्चिमी तट के इलाकों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के साथ-साथ सऊदी अरब के ख़िलाफ़ समुद्री नाकाबंदी और उसके क्षेत्र की गहराई में, विशेष रूप से महत्वपूर्ण तेल एवं आर्थिक प्रतिष्ठानों पर, भारी मिसाइल और ड्रोन हमले जारी रखे हुए हैं।

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