रहबर-ए-शहीद: एक चिराग़ जो बुझा नहीं छः माह गुज़र गए...

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रहबर-ए-शहीद: एक चिराग़ जो बुझा नहीं छः माह गुज़र गए...

छः माह पहले एक ख़बर ने दिलों को हिला दिया था। एक ऐसा नाम, जो बरसों से मुज़ाहमत, इस्तिक़ामत, बसीरत और ख़ुद्दारी के साथ जुड़ा हुआ था, हमारे दरमियान अपने ज़ाहिरी वुजूद के साथ मौजूद न रहा। आँखें अश्कबार हुईं, दिलों में एक ख़ला पैदा हुआ, मजालिस हुईं, ताज़ियती इज्तिमाआत हुए, तक़ारीर हुईं, नारे बुलंद हुए और अक़ीदतमंदों ने अपने-अपने अंदाज़ में अपने रहबर से मोहब्बत का इज़हार किया।

लेखकः मौलाना सय्यद हुसैन मेहदी

 छः माह पहले एक ख़बर ने दिलों को हिला दिया था। एक ऐसा नाम, जो बरसों से मुज़ाहमत, इस्तिक़ामत, बसीरत और ख़ुद्दारी के साथ जुड़ा हुआ था, हमारे दरमियान अपने ज़ाहिरी वुजूद के साथ मौजूद न रहा। आँखें अश्कबार हुईं, दिलों में एक ख़ला पैदा हुआ, मजालिस हुईं, ताज़ियती इज्तिमाआत हुए, तक़ारीर हुईं, नारे बुलंद हुए और अक़ीदतमंदों ने अपने-अपने अंदाज़ में अपने रहबर से मोहब्बत का इज़हार किया।

मगर छः माह बाद, जब जज़्बात का पहला तूफ़ान गुज़र चुका है और वक़्त हमें ज़रा ठहर कर सोचने का मौक़ा दे रहा है, तो एक सवाल पूरी शिद्दत के साथ हमारे सामने खड़ा है:

रहबर-ए-शहीद! आपके जाने के बाद हमने क्या हासिल किया?

क्या हम सिर्फ़ आपको याद करते रहे? या आपके मक़सद को भी याद रखा?

क्या हमने आपकी तस्वीरें सँभालीं? या आपके अफ़कार भी सँभाले?

क्या हमने आपके लिए आँसू बहाए? या आपके मिशन के लिए अपनी ज़िंदगी बदलने की कोशिश भी की?

ये सवाल किसी एक शख़्स से नहीं है। ये सवाल हम सब से है। और शायद यही वो सवाल है जिसका जवाब रहबर-ए-शहीद हमसे अपनी ख़ामोशी में माँग रहे हैं।

रहबर-ए-शहीद!

आप चले गए, मगर आपका सवाल हमारे दरमियान रह गया:

क्या तुम हुसैनؑ के रास्ते पर हो?

क्योंकि आपकी पूरी जद्दोजहद को अगर एक लफ़्ज़ में समेटा जाए तो वो लफ़्ज़ हुसैनؑ है।

हुसैनؑ सिर्फ़ एक तारीख़ी शख़्सियत नहीं; हुसैनؑ एक फ़िक्र हैं। हुसैनؑ सिर्फ़ कर्बला में शहीद होने वाले एक अज़ीम इंसान का नाम नहीं; हुसैनؑ हर उस इंसान की आवाज़ हैं जो ज़ुल्म के सामने झुकने से इंकार करता है। हुसैनؑ हर उस दिल की धड़कन हैं जो बातिल के इक़्तेदार से मरऊब नहीं होता। और हुसैनؑ हर उस इंसान के लिए एक सवाल हैं जो हक़ को पहचान लेने के बाद ख़ामोश रहना चाहता है।

इसीलिए कर्बला सिर्फ़ माज़ी नहीं है। कर्बला आज भी ज़िंदा है। आज भी यज़ीदियत मौजूद है, सिर्फ़ उसके लिबास बदल गए हैं। आज भी इस्तिकबार मौजूद है, सिर्फ़ उसके नारे बदल गए हैं। आज भी फ़रेब मौजूद है, सिर्फ़ उसके ज़राएअ जदीद हो गए हैं। और आज भी हुसैनؑ की ज़रूरत है, क्योंकि हक़ और बातिल की जंग कभी ख़त्म नहीं होती।

रहबर-ए-शहीद उसी हुसैनؑ के रास्ते के मुसाफ़िर थे। उन्होंने हमें सिर्फ़ ये नहीं बताया कि दुश्मन कौन है; उन्होंने हमें ये समझाने की कोशिश की कि हमें ख़ुद क्या बनना है। ये बहुत बड़ा फ़र्क़ है।

दुश्मन को पहचान लेना आसान है, अपने आपको मज़बूत बनाना मुश्किल है। दुश्मन पर नारा लगाना आसान है, अपनी जहालत के ख़िलाफ़ जंग करना मुश्किल है। दुश्मन की साज़िश बयान करना आसान है, अपनी क़ौम को साज़िशों से महफ़ूज़ बनाना मुश्किल है। और शायद यही वो मक़ाम है जहाँ हमसे सबसे ज़्यादा कोताही हुई है।

हमने मुज़ाहमत को बहुत दफ़ा सिर्फ़ नारे में महदूद कर दिया, हालाँकि मुज़ाहमत एक मुकम्मल ज़िंदगी का नाम है। किताब उठाना भी मुज़ाहमत है। तहक़ीक़ करना भी मुज़ाहमत है। इल्म हासिल करना भी मुज़ाहमत है। अपनी मआशियत मज़बूत करना भी मुज़ाहमत है। अपनी नस्ल की तरबियत करना भी मुज़ाहमत है। अपनी तहज़ीब और शनाख़्त की हिफ़ाज़त करना भी मुज़ाहमत है। झूठे प्रोपेगंडे के मुक़ाबले में सच को दलील के साथ पेश करना भी मुज़ाहमत है। और सबसे बढ़कर, अपने अंदर की कमज़ोरियों को शिकस्त देना भी मुज़ाहमत है।

क़ुरआन कहता है:

﴿قُلْ هَٰذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللَّهِ عَلَىٰ بَصِيرَةٍ أَنَا وَمَنِ اتَّبَعَنِي﴾

कह दीजिए: ये मेरा रास्ता है, मैं बसीरत के साथ अल्लाह की तरफ़ दावत देता हूँ, मैं भी और मेरे पैरवी करने वाले भी।

ग़ौर कीजिए! क़ुरआन ने सिर्फ़ रास्ते की बात नहीं की, बसीरत की बात की।

सिर्फ़ मोहब्बत काफ़ी नहीं; बसीरत भी चाहिए। सिर्फ़ अक़ीदत काफ़ी नहीं; शऊर भी चाहिए। सिर्फ़ जज़्बा काफ़ी नहीं; तदबीर भी चाहिए। सिर्फ़ नारा काफ़ी नहीं; किरदार भी चाहिए।

और यही रहबर-ए-शहीद की ज़िंदगी का एक बड़ा सबक़ था। वो क़ौम को सिर्फ़ जज़्बाती बनाना नहीं चाहते थे; वो क़ौम को बाख़बर, बाक़लियत, ख़ुद्दार और साहिब-ए-इरादा बनाना चाहते थे।

क्योंकि जो क़ौम इल्म में मोहताज हो, वो हमेशा किसी न किसी दरवाज़े पर दस्तक देती रहेगी। जो क़ौम फ़िक्र में मोहताज हो, वो दूसरों के बनाए हुए नज़रियात में ज़िंदगी गुज़ारेगी। जो क़ौम टेक्नोलॉजी में मोहताज हो, उसकी आज़ादी हमेशा महदूद रहेगी। और जो क़ौम अपनी तारीख़, तहज़ीब और शनाख़्त से बेख़बर हो, उसे दूसरों की लिखी हुई कहानियाँ अपने माज़ी की हक़ीक़त महसूस होने लगेंगी।

इसीलिए क़ुरआन का हुक्म है:

﴿وَأَعِدُّوا لَهُم مَّا اسْتَطَعْتُم مِّن قُوَّةٍ﴾

अपने दुश्मन के मुक़ाबले में जिस क़दर क़ुव्वत तुमसे हो सके, तैयार करो।

ये क़ुव्वत सिर्फ़ हथियार नहीं। आज एक अज़ीम साइंसदान भी क़ुव्वत है। एक मुख़लिस उस्ताद भी क़ुव्वत है। एक साहिब-ए-किरदार सहाफ़ी भी क़ुव्वत है। एक बाक़लियत इंजीनियर भी क़ुव्वत है। एक मुहक़्क़िक़ भी क़ुव्वत है। एक मज़बूत इदारा भी क़ुव्वत है। एक ख़ुदकफ़ील मआशियत भी क़ुव्वत है। और एक ऐसा नौजवान, जो ईमान के साथ जदीद इल्म रखता हो, सवाल करना जानता हो, तहक़ीक़ करना जानता हो और अपनी क़ौम के लिए सोचता हो, वो पूरी क़ौम की क़ुव्वत है।

यही वो इंक़िलाब है जिसकी हमें ज़रूरत है।

हम कब तक अपने नौजवानों को सिर्फ़ जलसों का सामेअ बनाते रहेंगे? कब तक उन्हें सिर्फ़ माज़ी के वाक़ियात सुनाते रहेंगे? कब हम उन्हें मुस्तक़बिल बनाने का हुनर सिखाएँगे?

कब हमारी क़ौम में ऐसे नौजवान पैदा होंगे जो क़ुरआन भी समझें और क्वांटम फ़िज़िक्स भी? जो नहजुल बलाग़ा भी पढ़ें और जदीद टेक्नोलॉजी भी जानें? जो कर्बला को भी समझें और दुनिया के बदलते हुए सियासी, मआशी और साइंसी नक़्शे को भी? जो अपने मौला से इश्क़ भी करें और अपनी ज़िम्मेदारी भी पहचानें?

रहबर-ए-शहीद की मोहब्बत का सबसे बड़ा सुबूत यही होगा कि हम एक ऐसी नस्ल तैयार करें जो सिर्फ़ अपने शोहदा पर फ़ख़्र न करे बल्कि ख़ुद भी क़ौम के लिए कुछ करने का हौसला रखती हो।

क्योंकि शहीद सिर्फ़ हमारे आँसुओं का मुस्तहिक़ नहीं होता; वो हमारी वफ़ादारी-ए-अमल का मुस्तहिक़ होता है।

क़ुरआन कहता है:

﴿وَلَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ قُتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتًا ۚ بَلْ أَحْيَاءٌ عِندَ رَبِّهِمْ يُرْزَقُونَ﴾

जो लोग राह-ए-ख़ुदा में क़त्ल किए गए, उन्हें मुर्दा न समझो; बल्कि वो अपने रब के पास ज़िंदा हैं और उन्हें रिज़्क़ दिया जाता है।

तो रहबर-ए-शहीद की शहादत का मतलब इख़्तिताम कैसे हो सकता है?

शहादत इख़्तिताम नहीं, ज़िम्मेदारी की मुन्तक़िली है।

कल वो बोलते थे, आज हमें बोलना है। कल वो क़ौम को बेदार करते थे, आज हमें अपने हिस्से की बेदारी पैदा करनी है। कल वो नौजवानों को पुकार रहे थे, आज वो पुकार हमारे कानों में है। कल वो दुश्मन के मुक़ाबले में खड़े थे, आज हमें अपने ज़माने के चैलेंजों के मुक़ाबले में खड़ा होना है।

और अगर हम ये न कर सके तो फिर हमारे ताज़ियती जलसे कितने ही बड़े क्यों न हों, हमारे नारे कितने ही बुलंद क्यों न हों, हमारी अक़ीदत कितनी ही ज़ाहिरी क्यों न हो, हम शहीद के मक़सद तक नहीं पहुँच सके।

कर्बला का यही तो राज़ है।

अगर इमाम हुसैनؑ की शहादत सिर्फ़ एक ग़म होती तो कर्बला तारीख़ का एक दर्दनाक बाब बनकर रह जाती। लेकिन ज़ैनबؑ ने उस ग़म को पैग़ाम बना दिया। इमाम ज़ैनुल आबिदीनؑ ने उस ख़ून को दुआ और तरबियत में बदल दिया। अहले-बैतؑ ने कर्बला को घरों, दिलों और नस्लों तक पहुँचा दिया। तब जाकर हुसैनؑ कर्बला से निकलकर पूरी तारीख़ में फैल गए।

आज रहबर-ए-शहीद के साथ भी हमारा इम्तिहान यही है।

क्या हम उनकी शहादत को सिर्फ़ एक सालाना ताज़ियती मौक़ा बनाएँगे? या उसे एक फ़िक्री तहरीक बनाएँगे?

क्या उनकी तस्वीर हमारे घरों में रहेगी? या उनका फ़िक्र हमारे किरदार में भी रहेगा?

क्या उनका नाम हमारे होंटों पर होगा? या उनका मक़सद हमारी तरजीहात में भी होगा?

ये फ़ैसला हमें करना है।

छः माह गुज़र गए हैं। अब वक़्त है कि हम अपने गरेबान में झाँकें। हमें देखना होगा कि हम कहाँ खड़े हैं। अगर हम अब भी वहीं हैं, जहाँ छः माह पहले थे, तो शायद हमें अपने आँसुओं से ज़्यादा अपनी ग़फ़लत पर रोना चाहिए।

अगर हमारे नौजवान अब भी इल्म से दूर हैं, तो हमें अपनी तरजीहात बदलनी होंगी। अगर हमारी क़ौम अब भी इख़्तिलाफ़ और इंतिशार का शिकार है, तो हमें अपने रवैयों पर नज़र डालनी होगी। अगर हमारे पास अपने इदारे नहीं, अपनी इल्मी तहरीक नहीं, अपनी तहक़ीकी ताक़त नहीं, अपनी मीडिया बसीरत नहीं, अपनी मआशी ख़ुदकफ़ालत नहीं, तो सिर्फ़ नारे हमें मंज़िल तक नहीं ले जा सकते।

इंक़िलाब पहले इंसान के अंदर पैदा होता है, फिर मुआशरे में उतरता है। और शायद आज हमें सबसे पहले अपने अंदर इंक़िलाब पैदा करने की ज़रूरत है।

अपनी सोच में इंक़िलाब। अपनी तरजीहात में इंक़िलाब। अपने इल्म में इंक़िलाब। अपने किरदार में इंक़िलाब। अपनी इज्तिमाई ज़िंदगी में इंक़िलाब। और अपने मुस्तक़बिल के बारे में अपने तसव्वुर में इंक़िलाब।

रहबर-ए-शहीद!

आपने जो चिराग़ जलाया था, वो हमारे हाथ में है। हमें फ़ैसला करना है कि उसे हवा से बचाएँगे या ख़ुद ही बुझा देंगे।

आपने जो रास्ता दिखाया था, वो हमारे सामने है। हमें फ़ैसला करना है कि उस पर चलेंगे या सिर्फ़ उसका तज़किरा करते रहेंगे।

आपने जिस नौजवान को मुस्तक़बिल का मेअमार समझा था, वो आज हमारे घरों में मौजूद है। हमें फ़ैसला करना है कि उसे सिर्फ़ नारा सिखाएँगे या इल्म भी देंगे, सिर्फ़ जोश देंगे या शऊर भी देंगे, सिर्फ़ माज़ी सुनाएँगे या मुस्तक़बिल बनाने का हुनर भी देंगे।

यही अस्ल इम्तिहान है।

और यही वो मक़ाम है जहाँ हमें एक बार फिर हुसैनؑ की तरफ़ देखना होगा।

हुसैनؑ ने कर्बला में हमें ये नहीं सिखाया कि हालात साज़गार हों तो हक़ के साथ खड़े होना। हुसैनؑ ने सिखाया कि हालात जैसे भी हों, हक़ को हक़ कहना है।

हुसैनؑ ने हमें ये नहीं सिखाया कि कामयाबी सिर्फ़ ज़िंदा रहने का नाम है। हुसैनؑ ने बताया कि कभी-कभी हक़ के लिए मर जाना, बातिल के साथ जीने से कहीं बड़ी कामयाबी होती है।

और शायद इसी लिए रहबर-ए-शहीद का रास्ता भी हमें यही सवाल देता है:

तुम्हारी ज़िंदगी किस मक़सद के लिए है?

अगर मक़सद सिर्फ़ अपनी ज़ात है तो तुम कभी इंक़िलाब नहीं ला सकते। अगर मक़सद सिर्फ़ अपनी शोहरत है तो तुम कभी तारीख़ नहीं बना सकते। अगर मक़सद सिर्फ़ अपनी आसाइश है तो तुम कभी क़ौम के मेअमार नहीं बन सकते।

लेकिन अगर मक़सद ख़ुदा है, हक़ है, इस्लाम है, इंसानियत है, मज़लूम की हिमायत है, इल्म है, इज़्ज़त है, आज़ादी है और तामीर-ए-उम्मत है, तो फिर एक इंसान भी तारीख़ का रुख़ बदल सकता है।

आज हम रहबर-ए-शहीद को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हुए सिर्फ़ ये नहीं कहेंगे:

आप बहुत अज़ीम थे।

हम कहेंगे:

आपने जो रास्ता दिखाया, हम उसे पहचानेंगे।

हम सिर्फ़ ये नहीं कहेंगे:

आपने क़ुर्बानी दी।

हम कहेंगे:

हम आपकी क़ुर्बानी को ज़ाए नहीं होने देंगे।

हम सिर्फ़ ये नहीं कहेंगे:

आप हमें याद रहेंगे।

हम कहेंगे:

आपका मक़सद हमारी ज़िंदगी में ज़िंदा रहेगा।

और ऐ रहबर-ए-शहीद!

हमें उम्मीद है कि आप अपने मौला व आक़ा, सय्यदुश्शोहदा हज़रत अबाअब्दिल्लाहिल हुसैन अलैहिस्सलाम के जिवार-ए-रहमत में, अहले-बैत-ए-अतहार अलैहिमुस्सलाम के सायाए रहमत में, और राह-ए-हक़ में जान क़ुर्बान करने वाले अपने तमाम शोहदा के साथ सरबुलंद होंगे।

हमें उम्मीद है कि वहाँ, जहाँ शहीद के लिए दुनिया की आवाज़ें ख़ामोश और हक़ीक़त के दरवाज़े खुले होते हैं, आप अपने मौला के हुज़ूर इस उम्मत के लिए दुआगो होंगे।

इस क़ौम के लिए दुआ कीजिए। इसके नौजवानों के लिए दुआ कीजिए। इसके मुस्तक़बिल के लिए दुआ कीजिए। इसकी इज़्ज़त व सरबुलंदी के लिए दुआ कीजिए। इसके इत्तिहाद के लिए दुआ कीजिए। इसके इल्म व तरक़्क़ी के लिए दुआ कीजिए। और परचम-ए-इस्लाम की सरबुलंदी के लिए दुआ कीजिए।

हम यहाँ ज़मीन पर कोशिश करेंगे, आप वहाँ अपने मौला के हुज़ूर दुआ कीजिए। हम यहाँ अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी अदा करने की कोशिश करेंगे, आप वहाँ अपने मौला से हमारे लिए मदद माँगिए।

और हम ये अहद करते हैं कि आपकी याद को सिर्फ़ आँसू नहीं बनने देंगे; उसे अमल बनाएँगे। आपकी शहादत को सिर्फ़ सोग नहीं बनने देंगे; उसे बेदारी बनाएँगे। आपके अफ़कार को सिर्फ़ तक़रीरों तक महदूद नहीं रखेंगे; उन्हें ज़िंदगी का हिस्सा बनाने की कोशिश करेंगे।

क्योंकि शहीद की सबसे बड़ी यादगार पत्थर की इमारत नहीं होती। शहीद की सबसे बड़ी यादगार वो इंसान होता है जो उसके मक़सद को अपनी ज़िंदगी बना ले।

रहबर-ए-शहीद!

आपकी आवाज़ अब माइक से नहीं आती, मगर हमें यक़ीन है कि वो तारीख़ के सीने से आ रही है।

आप हमारे दरमियान ज़ाहिरी तौर पर नहीं, मगर आपका सवाल हमारे सामने खड़ा है।

और हम उस सवाल से नज़रें नहीं चुराएँगे।

हम अपने आपसे पूछते रहेंगे:

क्या हम हुसैनؑ के रास्ते पर हैं?

और जब तक इस सवाल का जवाब अपने अमल से देने की कोशिश करते रहेंगे, तब तक आपका चिराग़ बुझा नहीं है।

वो चिराग़ हमारे हाथ में है।

अब ये हम पर है कि उसे जलाए रखते हैं या हवा के हवाले कर देते हैं।

ख़ुदा हमें इस अमानत का हक़ अदा करने की तौफ़ीक़ दे। ख़ुदा रहबर-ए-शहीद के दर्जात बुलंद फ़रमाए, उन्हें मुहम्मद व आले-मुहम्मद अलैहिमुस्सलाम के जिवार-ए-रहमत में जगह अता फ़रमाए, तमाम शोहदा-ए-राह-ए-हक़ के साथ महशूर फ़रमाए, और हमें उनके मक़सद, उनके अज़्म और उनके मिशन के साथ सच्ची वफ़ादारी की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

और ऐ अबाअब्दिल्लाहिल हुसैनؑ!

हमें अपने रास्ते से कभी भटकने न देना।

रहबर-ए-शहीद! आप वहाँ दुआ कीजिए, हम यहाँ कोशिश करेंगे।

यही हमारा अहद है। यही हमारी अक़ीदत है। और यही आपके ख़ून के साथ हमारी हक़ीक़ी वफ़ादारी है।

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