बहाई धर्म में नमाज़ और इबादत कैसे होती है?

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हर धर्म और संप्रदाय में इबादत उसके विश्वास और व्यावहारिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। इबादत के तरीकों को जानने से उसके अनुयायियों के विश्वास और जीवनशैली को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है। बहाई धर्म में भी इबादत का एक विशेष स्थान है और इसके लिए कुछ निश्चित नियम बताए गए हैं।

प्रस्तुत लेख बहाई धर्म में इबादत और उससे जुड़े नियमों का संक्षिप्त परिचय है, जिसे इस धर्म के अपने ग्रंथों और स्रोतों के आधार पर तैयार किया गया है।

किसी धर्म या संप्रदाय को समझना केवल उसके इतिहास और संस्थापकों की जानकारी तक सीमित नहीं है। उसकी इबादत की पद्धति और उससे जुड़े नियम भी उसे समझने का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इस लेख में बहाई धर्म में इबादत के तरीकों का उल्लेख किया गया है, जिसमें नमाज़ और क़िबला से लेकर वुज़ू, ज़िक्र और छूट गई नमाज़ से जुड़े नियम शामिल हैं।

इस लेख का उद्देश्य बहाई धर्म के बारे में उठाए गए सवालों की आलोचना या उनका जवाब देना नहीं है और न ही इस धर्म के दावों पर कोई फैसला सुनाना है। इसमें केवल बहाई धर्म के अपने ग्रंथों और स्रोतों के आधार पर उनके इबादत संबंधी नियमों को सरल और स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत किया गया है, ताकि पाठक यह समझ सकें कि इस धर्म में इबादत और धार्मिक कर्तव्यों के रूप में किन बातों को बताया गया है।

बहाई संप्रदाय में नमाज़ कैसे होती है?

बहाई धर्म में नमाज़ अनिवार्य इबादतों में शामिल है। ‘अक़दस’ नामक ग्रंथ में पहले 9 रकअत वाली एक अनिवार्य नमाज़ का उल्लेख किया गया था, लेकिन बाद में उसकी जगह तीन अनिवार्य नमाज़ें निर्धारित की गईं।

इन तीन नमाज़ों को नमाज़ ए बुलंद, नमाज़ ए मुतवस्सेता और नमाज़ ए कोताह कहा जाता है। बहाई अनुयायी को इनमें से किसी एक नमाज़ को चुनना होता है। यानी उसे एक दिन में तीनों नमाज़ें पढ़ना जरूरी नहीं है।

इन तीनों नमाज़ों में अंतर केवल उनके छोटा या बड़ा होने का नहीं है, बल्कि उनके समय और पढ़ने के तरीके में भी अंतर है। नमाज़ ए बुलंद 24 घंटे में एक बार पढ़ी जाती है। नमाज़ ए मुतवस्सेता सुबह, दोपहर और शाम तीन समय पढ़ी जाती है, जबकि नमाज़ ए कोताह दोपहर से सूर्यास्त के बीच एक बार पढ़ी जाती है।

इस तरह एक बहाई अनुयायी के लिए हर दिन एक अनिवार्य नमाज़ है, लेकिन वह निर्धारित तीन नमाज़ों में से किसी एक को चुन सकता है।

दैनिक नमाज़ों की विषयवस्तु

नमाज़ ए कोताह: नमाज़ ए कोताह में नमाज़ पढ़ने वाला सबसे पहले इस बात की गवाही देता है कि ईश्वर ने उसे अपनी पहचान और इबादत के लिए पैदा किया है। इसके बाद वह अपनी कमजोरी और आवश्यकता तथा ईश्वर की शक्ति और बेनियाज़ी को स्वीकार करता है।

“اَشهُدُ یا الهی بأنّکَ خَلَقتَنی لِعِرفانِک و عبادتک. أشهُدُ فی هذَا الحین بعَجزی و قوّتک و ضعفی و اقتدارِک و فقری و غنائِک. لا اله الاّ أنت المهیمن القیّوم अश्हदो या इलाही बिअन्नका ख़लक़तनी लेइरफ़ानेका व इबादतिक। अश्हदो फ़ी हाज़ल-हीने बेअजज़ी व क़ुव्वतिक व ज़ोफ़ी व इक़्तिदारिक व फ़क़्री व ग़िनाइक। ला इलाहा इल्ला अन्तल-मुहैमिनुल-क़य्यूम।”

अर्थ: ऐ मेरे पालनहार! मैं गवाही देता हूँ कि तूने मुझे अपनी पहचान और इबादत के लिए पैदा किया है। इस समय मैं अपनी कमजोरी और तेरी शक्ति, अपनी दुर्बलता और तेरे सामर्थ्य, अपनी आवश्यकता और तेरी बेनियाज़ी की गवाही देता हूँ। तेरे अलावा कोई उपास्य नहीं है, तू निगरानी रखने वाला और हमेशा कायम रहने वाला है।

नमाज़ ए वुस्ता: यह नमाज़ ईश्वर की एकता को स्वीकार करने और उसके नए प्रकट होने की गवाही से शुरू होती है। इसमें नमाज़ पढ़ने वाला ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसे निराश न करे, क्योंकि वह उसकी दया और क्षमा की आशा लेकर उसकी ओर आया है।

नमाज़ ए बुलंद: यह नमाज़ विभिन्न दुआओं और मुनाजात के विषयों पर आधारित है। इसमें नमाज़ पढ़ने वाला ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसकी नमाज़ ऐसी आग बन जाए जो उन पर्दों को जला दे जो ईश्वर के सौंदर्य के दर्शन में बाधा बनते हैं और ऐसा प्रकाश बन जाए जो उसे मिलन के समुद्र तक पहुँचा दे। इसके अन्य हिस्सों में ईश्वर की इच्छा के सामने समर्पण और संतोष पर जोर दिया गया है तथा ईश्वर की क्षमा और कृपा की आशा व्यक्त की गई है। अंत में वह जुदाई की शिकायत करते हुए ईश्वर से उसके निकट पहुँचने और उसकी कृपा व क्षमा से लाभान्वित होने की प्रार्थना करता है।

बहाईयो का क़िबला किस दिशा में है?

बहाई धर्म में क़िबला काबा नहीं है। ‘अक़दस’ ग्रंथ के अनुसार, बहाउल्लाह की मृत्यु के बाद अक्का के पास स्थित ‘बहजी’ में उनके दफन स्थान को क़िबला निर्धारित किया गया। इसलिए बहाई अनुयायी को वाजिब नमाज़ पढ़ते समय इस स्थान की ओर मुंह करना होता है।

हालांकि यह नियम केवल वीजिब नमाज़ के लिए है। दुआओं और ग़ैर वाजिब इबादतों के समय बहाई अनुयायी के लिए इस दिशा की ओर मुंह करना जरूरी नहीं है।

बहाई वुज़ू कैसे करते है?

वुज़ू भी बहाई धर्म के इबादत संबंधी नियमों का हिस्सा है, लेकिन इसका तरीका मुसलमानों के वुज़ू से अलग है। बहाई वुज़ू में पहले हाथ और फिर चेहरा धोते है और यह काम वाजिब नमाज़ से पहले किया जाता है।

नमाज़ ए वुस्ता के दौरान हाथ और चेहरा धोते समय कुछ विशेष ज़िक्र भी पढ़े जाते हैं। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इन नियमों में वुज़ू केवल शरीर के अंगों की बाहरी सफाई का नाम नहीं है। यदि कोई व्यक्ति नमाज़ से पहले स्नान कर चुका हो, तब भी उसे नमाज़ के लिए निर्धारित वुज़ू करना होता है।

हर वाजिब नमाज़ के लिए नया वुज़ू करना सामान्य नियम है। हालांकि, यदि दो वाजिब नमाज़ें दोपहर के समय पढ़ी जाएं, तो दोनों के लिए एक ही वुज़ू पर्याप्त है।

यदि पानी उपलब्ध न हो या हाथ और चेहरे पर पानी इस्तेमाल करना नुकसानदायक हो, तो वुज़ू के बदले यह विशेष ज़िक्र पाँच बार पढ़ना होता है: “बिस्मिल्लाहिल अतहरिल अतहर।”

‘अल्लाहो अबही’—95 बार पढ़ा जाने वाला ज़िक्र

बहाई धर्म में इबादत केवल अनिवार्य नमाज़ तक सीमित नहीं है। इस धर्म के इबादत संबंधी नियमों में रोज़ाना “अल्लाहो अबही” का ज़िक्र करना भी शामिल है।

‘अक़दस’ ग्रंथ में कहा गया है कि बहाई अनुयायी को हर दिन हाथ और चेहरा धोने के बाद बैठकर ईश्वर की ओर मुंह करके यह ज़िक्र 95 बार दोहराना चाहिए।

बहाई स्रोतों में “अल्लाहो अबही” का अर्थ “ईश्वर सबसे अधिक प्रतापी है” बताया गया है और इसे इस धर्म में “इस्म-ए-आज़म” यानी महान नाम की अवधारणा से जोड़ा गया है।

इसलिए यहां 95 की संख्या केवल कोई व्यक्तिगत परंपरा या सुझाव नहीं है, बल्कि बहाई धर्म के इबादत संबंधी नियमों में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

क्या बहाई धर्म में नमाज़ जमाअत के साथ पढ़ी जाती है?

बहाई धर्म में वाजिब नमाज़ व्यक्तिगत रूप से पढ़ी जाती है और इस धर्म में इस्लाम की तरह नमाज़-ए-जमाअत का प्रचलन नहीं है।

‘अक़दस’ ग्रंथ में स्पष्ट किया गया है कि वाजिब नमाज़ व्यक्तिगत रूप से पढ़ी जानी चाहिए और उसके लिए जमाअत की नमाज़ को निर्धारित नहीं किया गया है। केवल नमाज़-ए-मय्यत इस मामले में अलग है।

हालांकि, बहाई अनुयायी विभिन्न सभाओं में एकत्र होकर दुआ, मुनाजात और अपने धार्मिक ग्रंथों के पाठ कर सकते हैं, लेकिन इन सभाओं को वाजिब नमाज़ की जमाअत नहीं कहा जाता।

नमाज़ किस उम्र से वाजिब होती है?

बहाई धर्म के नियमों के अनुसार, नमाज़ और रोज़े के लिए धार्मिक कर्तव्यों की उम्र 15 वर्ष निर्धारित की गई है। यह नियम पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान है।

हालांकि, कुछ लोगों को इससे छूट दी गई है। इनमें बीमार लोग और 70 वर्ष से अधिक उम्र के लोग शामिल हैं। महिलाओं के लिए मासिक धर्म के दौरान अलग नियम निर्धारित किया गया है।

मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के लिए क्या नियम है?

इस अवधि में बहाई महिला वाजिब नमाज़ से मुक्त होती है। इसके बदले वुज़ू करने के बाद उसे एक दोपहर से अगली दोपहर तक 95 बार एक विशेष ज़िक्र पढ़ना होता है: “सुब्हानल्लाहि रब्बिल-बहाई वल-जमाल।”

इस तरह इस अवधि में सामान्य रूप से वाजिब नमाज़ नहीं पढ़ी जाती, बल्कि उसकी जगह यह ज़िक्र किया जाता है।

यदि नमाज़ क़ज़ा हो जाए तो क्या किया जाता है?

क़ज़ा हुई नमाज़ के संबंध में बहाई धर्म के नियमों में बताई गई परिस्थितियों को ध्यान में रखना होता है। ‘अक़दस’ ग्रंथ में उस स्थिति के लिए विशेष व्यवस्था बताई गई है, जब नमाज़ का समय आने पर कोई व्यक्ति असुरक्षित स्थिति में हो और उसके लिए नमाज़ पढ़ना संभव न हो।

ऐसे व्यक्ति को सुरक्षित स्थान पर पहुंचने के बाद, उस परिस्थिति में छूटी हुई प्रत्येक अनिवार्य नमाज़ के बदले एक सज्दा करना होता है। सभी सज्दे पूरे करने के बाद उसे बैठकर एक विशेष ज़िक्र भी पढ़ना होता है।

‘अक़दस’ से संबंधित सवाल-जवाब में स्पष्ट किया गया है कि यदि यात्रा के दौरान व्यक्ति के लिए कोई सुरक्षित स्थान उपलब्ध हो, तो अनिवार्य नमाज़ पढ़ना जरूरी है और केवल यात्रा करने से नमाज़ माफ नहीं होती। इसी तरह घर में छूटी हुई नमाज़ के संबंध में भी सज्दा-ए-जबरानी का नियम बताया गया है।

बहाई धर्म में रोज़ा

बहाई धर्म में रोज़ा ‘अला’ महीने में रखा जाता है। यह बहाई कैलेंडर का अंतिम महीना है।

बहाई कैलेंडर में 19 महीने होते हैं और हर महीने में 19 दिन होते हैं। इसलिए ‘अला’ महीना भी 19 दिनों का होता है।

यह महीना आम तौर पर ईरानी कैलेंडर के अंतिम महीने (इस्फ़ंद) के कुछ हिस्से के साथ पड़ता है और इन्हीं 19 दिनों में बहाई रोज़ा रखा जाता है।

इस अवधि में व्यक्ति सूर्योदय से सूर्यास्त तक खाने और पीने से परहेज करता है।

स्रोत:

‘अक़दस’ ग्रंथ, नमाज़ और इबादत से संबंधित अध्याय, बहाई धर्म की आधिकारिक वेबसाइट

बहाई संदर्भ पुस्तकालय, ‘अक़दस’ का पूरा पाठ और ‘सवाल और जवाब’ का भाग

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