डॉ. पिज़िश्कियान ने संयुक्त राष्ट्र में दुनिया के ज़मीर को झकझोर दिया

Rate this item
(0 votes)
डॉ. पिज़िश्कियान ने संयुक्त राष्ट्र में दुनिया के ज़मीर को झकझोर दिया

संयुक्त राष्ट्र के 81वें अधिवेशन में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पिज़िश्कियान का एक हाथ में आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की तस्वीर और दूसरे हाथ में मिनाब स्कूल के शहीदों की तस्वीरें लेकर खड़ा होना केवल एक कूटनीतिक दृश्य नहीं था। यह उस देश की पुकार थी, जिस पर अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त आक्रामकता थोपी गई और जिसकी कीमत ईरानी जनता, विशेष रूप से मासूम बच्चों ने अपने खून से चुकाई।

लेखक: मौलाना सैयद करामत हुसैन शऊर जाफरी

 संयुक्त राष्ट्र के 81वें अधिवेशन में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पिज़िश्कियान का एक हाथ में आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की तस्वीर और दूसरे हाथ में मिनाब स्कूल के शहीदों की तस्वीरें लेकर खड़ा होना केवल एक कूटनीतिक दृश्य नहीं था। यह उस देश की पुकार थी, जिस पर अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त आक्रामकता थोपी गई और जिसकी कीमत ईरानी जनता, विशेष रूप से मासूम बच्चों ने अपने खून से चुकाई।

पिज़िश्कियान ने दुनिया के सामने अपने भाषण से अधिक प्रभावशाली एक तस्वीर पेश की। यह तस्वीर किसी सैनिक की नहीं, बल्कि एक मासूम छात्र की थी।

28 फरवरी 2026 को ईरान के मिनाब शहर में शजर-ए-तय्यबा गर्ल्स स्कूल पर हुआ हमला आधुनिक युद्ध की उस क्रूर सच्चाई की याद दिलाता है, जिसमें मिसाइल और बम चलाने वाले सुरक्षित दूरी पर रहते हैं, जबकि उनके निशाने पर आने वाले घरों, स्कूलों और परिवारों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं होता। एमनेस्टी इंटरनेशनल की जांच के अनुसार, इस हमले में 156 लोग मारे गए, जिनमें 120 बच्चे शामिल थे। जिस स्कूल में बच्चियों के हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, वहां खून और मलबा रह गया।

यह घटना इसलिए भी अधिक दुखद है कि अमेरिका दुनिया की सबसे आधुनिक सैन्य और खुफिया क्षमताओं वाले देशों में शामिल है। उसके पास उपग्रह, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आधुनिक निगरानी प्रणालियां, अत्यधिक सटीक मिसाइलें और लक्ष्यों की पहचान के लिए अनेक साधन मौजूद हैं। इसके बावजूद यदि किसी स्कूल को सैन्य लक्ष्य समझकर नष्ट कर दिया जाए, तो सवाल केवल एक गलती का नहीं रह जाता, बल्कि उस युद्ध प्रणाली की नैतिक जिम्मेदारी का भी बन जाता है, जो अपनी तकनीकी श्रेष्ठता पर गर्व करती है, लेकिन मानव जीवन की रक्षा करने में विफल रहती है।

बाद की जांच में भी यह सवाल सामने आया कि अमेरिकी लक्ष्य निर्धारण प्रणाली में स्कूल की पहचान को लेकर गंभीर गलती हुई। यानी जिस इमारत में बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, वह ऐसी प्रणाली की नजर में सैन्य लक्ष्य बन गई, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि वह दुनिया की सबसे आधुनिक लक्ष्य निर्धारण प्रणालियों में से एक है। यदि आधुनिकतम तकनीक भी एक स्कूल और सैन्य ठिकाने के बीच अंतर नहीं कर सके, तो युद्ध की तथाकथित "सटीकता" के दावे किस काम के हैं?

अमेरिका इस हमले में बच्चों को जानबूझकर निशाना बनाने से इनकार करता रहा है और इसे लक्ष्य की पहचान में हुई गलती बताता है। लेकिन एक मां के लिए शायद यह अंतर उतना महत्वपूर्ण नहीं है कि मिसाइल जानबूझकर उसके बच्चे के स्कूल पर आई थी या गलती से। उसके लिए सच्चाई सिर्फ इतनी है कि उसका बच्चा स्कूल गया था और वापस नहीं आया। मलबे में मिली किताब, जला हुआ बस्ता और खून से सनी वर्दी किसी सैन्य बयान से अधिक प्रभावशाली गवाही बन जाते हैं।

ईरान पर हुए अमेरिकी और इज़राइली सैन्य अभियानों की त्रासदी यह है कि वैश्विक शक्तियों के इस संघर्ष में एक ऐसा देश निशाने पर है, जिसके आम नागरिकों की युद्ध संबंधी फैसलों में कोई भूमिका नहीं है। घरों, बाजारों, बुनियादी ढांचे और शैक्षणिक संस्थानों पर होने वाले हमलों का सबसे बड़ा बोझ आम ईरानी नागरिक उठाते हैं। ईरान ने जिस आक्रामकता का सामना किया, उसके मुकाबले उसके लोगों का अपने देश, अपनी भूमि और अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए खड़ा होना केवल राजनीतिक रुख नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतिरोध की एक तस्वीर भी है।

इस संदर्भ में पिज़िश्कियान का संयुक्त राष्ट्र में खून से सना बस्ता उठाना एक उल्लेखनीय कूटनीतिक कदम था। उन्होंने वैश्विक शक्तियों के सामने ईरान की पीड़ा को केवल शब्दों में व्यक्त नहीं किया, बल्कि उसे ऐसी प्रतीकात्मक तस्वीर में बदल दिया, जिसे दुनिया का कोई भी व्यक्ति आसानी से नजरअंदाज नहीं कर सकता। एक राष्ट्रपति के हाथ में खून से सना बस्ता उन सभी बच्चों का प्रतिनिधित्व कर रहा था, जो शक्तिशाली देशों की युद्ध नीतियों के कारण अपने घरों, स्कूलों और सपनों से वंचित हो जाते हैं।

इस संदर्भ में इज़राइल की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। फिलिस्तीन में वर्षों से जारी इज़राइली सैन्य कार्रवाइयों ने दुनिया को दिखाया है कि जब किसी शक्तिशाली राज्य को जवाबदेही से छूट का एहसास होने लगे, तो आम नागरिकों की आबादी किस तरह युद्ध का आसान निशाना बन जाती है। ईरान पर इज़राइली हमलों और अमेरिकी सैन्य शक्ति की भागीदारी ने मध्य पूर्व के पहले से गंभीर संकट को और अधिक खतरनाक बना दिया है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दुखद बात यह है कि मानव जीवन की रक्षा का सिद्धांत शक्ति के संतुलन के नीचे दब जाता है।

ईरान के खिलाफ बल प्रयोग को कुछ लोग अपने राजनीतिक और सैन्य हितों के लिए उचित ठहराने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन किसी देश की राजनीतिक नीतियों से असहमति उसके नागरिकों को निशाना बनाने का औचित्य नहीं बन सकती। ईरान की सरकार से मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन ईरानी बच्चों का खून किसी राजनीतिक विवाद का हिस्सा नहीं है। जिस तरह फिलिस्तीनी बच्चे का जीवन मूल्यवान है, उसी तरह ईरानी बच्चे का जीवन भी मूल्यवान है। मानवता का सिद्धांत यही है कि पीड़ित का समर्थन उसकी राष्ट्रीयता, धर्म या राजनीतिक संबद्धता देखकर नहीं किया जाना चाहिए।

पिज़िश्कियान का खून से सना बस्ता इसी मानवीय सिद्धांत की याद दिलाता है। यह बस्ता एक मिसाइल से भी अधिक प्रभावशाली सवाल बनकर दुनिया के सामने आया: यदि आधुनिक दुनिया वास्तव में मानवाधिकारों की रक्षक है, तो स्कूल में पढ़ने वाली बच्चियों की सुरक्षा क्यों नहीं हो सकी? यदि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाई गई हैं, तो मासूम बच्चों के खून पर इतनी खामोशी क्यों है? और यदि सैन्य शक्ति को कानून और नैतिकता के अधीन होना चाहिए, तो शक्तिशाली देशों के लिए मानक अलग क्यों दिखाई देते हैं?

ईरान ने इस युद्ध में केवल सैन्य दबाव का सामना नहीं किया, बल्कि अपने नागरिकों के जान-माल की सुरक्षा की कठिन परीक्षा का भी सामना किया। ऐसे समय में पिज़िश्कियान का वैश्विक मंच पर खड़े होकर खून से सनी तस्वीरें उठाना ईरान की पीड़ा को दुनिया के सामने लाने का एक प्रभावी प्रयास था। उन्होंने उस खामोश बस्ते को ईरान के उन बच्चों की आवाज बना दिया, जिनकी आवाज बमों के शोर में दब गई।

दुनिया को यह समझना होगा कि युद्ध की वास्तविक तस्वीर मिसाइलों, लड़ाकू विमानों और सैन्य नक्शों में नहीं मिलती। युद्ध की असली तस्वीर एक मां के आंसुओं, एक पिता की खामोशी, मलबे में पड़ी एक किताब और खून से रंगे एक बच्चे के बस्ते में दिखाई देती है। मिनाब का खून से सना बस्ता इसी सच्चाई का प्रतीक है।

संयुक्त राष्ट्र के सभागार में पिज़िश्कियान के हाथ में उठा वह बस्ता आने वाले समय में एक ऐतिहासिक तस्वीर बन सकता है। एक ओर दुनिया की बड़ी शक्तियां, उनकी सेनाएं, उनके हथियार और उनके राजनीतिक हित; दूसरी ओर एक मासूम बच्चे का बस्ता। शक्ति के इस मुकाबले में शायद सबसे कमजोर दिखाई देने वाली चीज ही सबसे बड़ा सवाल बन गई: आखिर एक बच्चे का कसूर क्या था?

युद्ध समाप्त हो जाते हैं, मिसाइलें शांत हो जाती हैं, कूटनीतिक बयान बदल जाते हैं और वैश्विक शक्तियां अपने हितों के अनुसार नए गठबंधन बना लेती हैं, लेकिन बच्चों के खून के निशान इतिहास से नहीं मिटते। पिज़िश्कियान ने संयुक्त राष्ट्र में जो खून से सना बस्ता उठाया, वह केवल ईरान के पीड़ित बच्चों का प्रतीक नहीं था; वह वैश्विक समुदाय के सामने रखा गया एक आईना था। इस आईने में अमेरिका और इज़राइल की सैन्य शक्ति भी दिखाई देती है, वैश्विक राजनीति के दोहरे मानदंड भी और एक पीड़ित राष्ट्र की वह पुकार भी, जो दुनिया से केवल इतना चाहती है कि मानव जीवन को शक्ति और राजनीति से ऊपर समझा जाए।

Read 2 times