मौलाना फरमान अली की शैक्षणिक और शिक्षण सेवाएँ योगदान अविस्मरणीय है

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मौलाना फरमान अली की शैक्षणिक और शिक्षण सेवाएँ योगदान अविस्मरणीय है

हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सय्यद शाहिद जमाल रिज़वी क़ुमी गोपालपुरी ने क़ुरआन के अनुवादक एवं व्याख्याकार अल्लामा मौलाना सैयद फरमान अली (अल्लाह उनके दर्जे बुलंद करे) की शैक्षणिक, शिक्षण और शिक्षा के क्षेत्र में दी गई सेवाओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा है कि अल्लामा फरमान अली (रह.) ने मदरसा सुल्तानिया, पटना के विकास के लिए दिन-रात मेहनत की और अपने संक्षिप्त शिक्षण काल में कई प्रतिष्ठित विद्वानों और ज्ञानवान व्यक्तियों का प्रशिक्षण किया। उन्होंने मदरसा सुल्तानिया की एक सदी से अधिक की शैक्षणिक और धार्मिक सेवाओं को सुरक्षित रखने के लिए मौलाना शेख इब्ने हसन अमलवी के शोध और लेखन संबंधी प्रयासों को भी सराहनीय बताया।

 क़ुरआन के अनुवादक एवं व्याख्याकार स्वर्गीय अल्लामा मौलाना सय्यद फरमान अली (अल्लाह उनके दर्जे बुलंद करे) की शैक्षणिक एवं धार्मिक सेवाओं और उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालने के लिए आयोजित सम्मेलन के सिलसिले में अपने विचार व्यक्त करते हुए शुऊरे विलायत फाउंडेशन के निदेशक हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद शाहिद जमाल रिज़वी क़ुमी गोपालपुरी ने मदरसा सुल्तानिया, पटना के इतिहास तथा उसकी स्थापना और विकास में अल्लामा फरमान अली (रह.) की भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने मदरसा सुल्तानिया के इतिहास पर मौलाना शेख इब्ने हसन अमलवी द्वारा संकलित पुस्तक को नई पीढ़ियों के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं शोधपरक दस्तावेज़ बताया।

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

धार्मिक मदरसे इस्लाम के मज़बूत किले, मार्गदर्शन के स्रोत, शांति और सद्भाव के केंद्र, धर्म की शरणस्थली तथा धर्म और समुदाय के प्रचार-प्रसार का बेहतरीन और प्रभावी माध्यम हैं। इन मदरसों ने हर दौर में तमाम कठिनाइयों, समस्याओं, पाबंदियों और विरोध के बावजूद किसी न किसी रूप में अपना अस्तित्व और स्थान बनाए रखा है तथा इस्लामे नाबे मुहम्मदी (स.) की रक्षा और उसके अस्तित्व को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

धार्मिक मदरसों के इसी महत्व और उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए अज़ीमाबाद (पटना) शहर के धार्मिक कार्यकर्ता और प्रतिष्ठित नागरिक जनाब सैयद अल्ताफ हुसैन मरहूम ने शहर और उसके आसपास के क्षेत्रों की गंभीर आवश्यकता को देखते हुए 9 रबीउल अव्वल 1323 हिजरी को एक मदरसे की स्थापना की। उन्होंने इसके पहले प्रधान शिक्षक (प्रिंसिपल) का पद स्वीकार करने के लिए अल्लामा सैयद फरमान अली (अल्लाह उनके दर्जे बुलंद करे) से विशेष अनुरोध किया। चूँकि अल्लामा फरमान अली मरहूम भी इस मदरसे की स्थापना के प्रयासों में काफी हद तक सक्रिय रहे थे, इसलिए उन्होंने यह पद सहर्ष स्वीकार कर लिया।

अल्लामा फरमान अली (अल्लाह उनके दर्जे बुलंद करे) के जीवन और विशेषताओं पर दो खंडों में पुस्तक 'तर्जुमाने फ़ुरक़ान' लिखते समय इस मदरसे के बारे में भी छानबीन करने की आवश्यकता पड़ी। इसके शुरुआती हालात और सुधार संबंधी जानकारियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के अलग-अलग अंकों से प्राप्त हुईं। इन सभी अंकों का सरसरी अध्ययन करने से यह अंदाज़ा हुआ कि जनाब सैयद अल्ताफ हुसैन मरहूम ने जिस नेक नीयती से इस मदरसे की नींव रखी थी, अल्लामा फरमान अली मरहूम ने भी उसी नेक नीयती से इसकी देखभाल की और बहुत कम समय में इसे तरक्की और सफलता की राह पर आगे बढ़ाया।

हक़ीक़त यह है कि मदरसा सुल्तानिया की तरक्की और कामयाबी के लिए अल्लामा फरमान अली मरहूम ने दिन-रात एक कर दिया था। वे केवल एक प्रधान शिक्षक यानी प्रिंसिपल नहीं थे, जो निर्धारित समय पर मदरसे पहुँचें, रजिस्टर में अपनी उपस्थिति दर्ज करें और फिर रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त हो जाएँ। वे जानते थे कि यह मदरसा पूरे बिहार की एक बड़ी आवश्यकता है। इसी वजह से वे दिन-रात मेहनत करके इसे उस मुकाम तक पहुँचाना चाहते थे, जहाँ इसे देखकर लोग महसूस कर सकें कि जिस आवश्यकता को लेकर यह स्थापित किया गया था, वह पूरी हो गई है। शायद यही कारण था कि जब भी विद्वान और समुदाय के प्रतिष्ठित लोग मदरसे आते और वहाँ की व्यवस्था को करीब से देखते, तो उसकी प्रशंसा किए बिना नहीं रह पाते थे।

अल्लामा फरमान अली मरहूम ने अपने बहुत ही संक्षिप्त शिक्षण काल में अनेक प्रतिभाशाली और उल्लेखनीय शिष्यों का प्रशिक्षण किया। इनमें इस्लाम के दार्शनिक और उस्तादुल वाएज़ीन अल्लामा सैयद अदील अख्तर जैदी, मौलाना सैयद राहत हुसैन भीकपुरी, क़ुरआन के व्याख्याकार मौलाना सैयद हिफाज़त हुसैन भीकपुरी और मौलाना सैयद गुलाम मुस्तफा गोपालपुरी जैसी महत्वपूर्ण एवं प्रतिष्ठित हस्तियाँ शामिल हैं।

स्पष्ट है कि बिहार के इस प्रतिष्ठित मदरसे का अतीत अत्यंत गौरवशाली रहा है। अपने 123 वर्षों के सफर में इसने अनेक अनमोल प्रतिभाओं को तराशकर समुदाय के हवाले किया है और धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज भी यह मदरसा अपनी क्षमता के अनुसार व्यापक सेवाएँ दे रहा है। दो वर्ष पहले जब बिहार के विद्वानों की लिखित रचनाओं को एकत्र करने और उनके जीवन-परिचय पर आधारित पुस्तक तैयार करने का काम चल रहा था, तब लंबे समय बाद मदरसा सुल्तानिया जाने का अवसर मिला। वहाँ जाकर पुस्तकालय को करीब से देखा। उसमें पांडुलिपियों की अच्छी-खासी संख्या मौजूद है और पुरानी पुस्तकों का भी बहुत अच्छा संग्रह है।

आवश्यकता इस बात की थी कि एक सदी से अधिक पुराने इस मदरसे की सेवाओं को एक स्वतंत्र पुस्तक में दर्ज किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इसका इतिहास और इसके उतार-चढ़ाव सुरक्षित हो सकें। अल्हम्दुलिल्लाह, यह काम हमारे सम्मानित बुज़ुर्ग विद्वान, लेखक, साहित्यकार, पत्रकार, शोधकर्ता और संपादक हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना शेख इब्ने हसन अमलवी वाएज़ (उनकी बरकतें बनी रहें) ने अंजाम दिया है।

हमें इस सम्मानित लेखक से पूरी उम्मीद है कि उन्होंने पुस्तक की रूपरेखा तैयार करते समय इस मदरसे के अतीत और वर्तमान के सभी पहलुओं तथा उसके उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखा होगा। इसकी वजह यह है कि उन्होंने इस पुस्तक के अलावा भारत के कुछ शिया मदरसों के इतिहास पर भी कई पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने केवल मदरसतुल वाएज़ीन का इतिहास ही तीन विशाल खंडों में संकलित किया है। इसी तरह जवादिया अरबी कॉलेज (बनारस), वसीक़ा अरबी कॉलेज (फ़ैज़ाबाद), सुल्तानुल मदरिस (लखनऊ) आदि के इतिहास को भी बड़े सलीके से संकलित किया है और विद्वानों तथा समुदाय के प्रतिष्ठित लोगों से सराहना प्राप्त की है।

अल्लामा फरमान अली (अल्लाह उनके दर्जे बुलंद करे) का इतिहास संकलित करते समय लेखक महोदय से टेलीफोन पर संपर्क हुआ। चूँकि वे मेरे प्रिय मित्र मौलाना शेख मसरूर फैज़ी के पिता हैं, इसलिए उन्होंने बताया कि उनके पिता बिहार के मदरसा सुल्तानिया पर एक पुस्तक लिख रहे हैं। हमने उन्हें फोन किया और काफी देर तक बातचीत हुई। इस दौरान कुछ विषयों पर विचारों का आदान-प्रदान भी हुआ। इसी बातचीत में लेखक ने बताया कि मदरसा सुल्तानिया के इतिहास पर लगभग 500 से अधिक पृष्ठों की पुस्तक तैयार हो चुकी है। यह सुनकर बेहद खुशी हुई और दिल से उनके लिए दुआएँ निकलीं कि इस पुस्तक के माध्यम से बिहार के एक महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित मदरसे का इतिहास आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित हो जाएगा।

मुझे इस बात की जानकारी है कि लेखक ने इस पुस्तक के संकलन में काफी मेहनत और कठिनाइयाँ उठाई हैं। इस वृद्धावस्था में उन्होंने कई बार पटना की यात्रा की, वहाँ से अनेक दस्तावेज़ और पांडुलिपियाँ एकत्र कीं तथा विभिन्न लोगों से संपर्क करके जानकारियाँ जुटाईं। इस प्रयास की जितनी सराहना की जाए, कम है। यद्यपि यह पुस्तक इस विषय पर अपनी तरह की पहली कृति है, लेकिन अपनी अग्रणी हैसियत के कारण इसका महत्व और दस्तावेज़ी मूल्य हमेशा बना रहेगा। इसके बाद इस विषय पर जो भी पुस्तक या शोधग्रंथ तैयार होगा, उसमें और जानकारियाँ जुड़ती रहेंगी, क्योंकि शोध और खोज की कोई भी मंज़िल अंतिम मंज़िल नहीं होती।

मैं अल्लाह तआला की बारगाह में दुआ करता हूँ कि वह इस सम्मानित लेखक और पुस्तक के प्रकाशक 'इंटरनेशनल नूर माइक्रोफिल्म सेंटर', ईरान कल्चर हाउस, दिल्ली को इस महान सेवा का प्रतिफल प्रदान करे और आम मोमिनों को इस पुस्तक से लाभ उठाने की तौफ़ीक़ अता करे। आमीन या रब्बुल आलमीन।

वस्सलाम

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