हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सय्यद मंज़ूर रज़ा आबिदी ने जुमे की नमाज़ के ख़ुत्बे में यमन की मज़लूम जनता के समर्थन, उम्मते-मुस्लिमा की एकता और ईरान के प्रति अमेरिका की नीतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस्लामी दुनिया को आपसी मतभेदों के बजाय साझा चुनौतियों का मुकाबला मिलकर करना चाहिए। उन्होंने सामाजिक सुधार, शिक्षा के प्रसार और आत्मसुधार को एक नेक और उद्देश्यपूर्ण समाज की बुनियादी ज़रूरत बताया।
भारत की कर्नाटक राज्य के अलीपुर शहर की मस्जिदे जाफ़रिया में आयोजित जुमे की नमाज़ के ख़ुत्बों में हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सय्यद मंज़ूर रज़ा आबिदी ने इस्लामी दुनिया की मौजूदा स्थिति, यमन की मज़लूम जनता की समस्याओं, सऊदी अरब की नीतियों और अमेरिका में राजनीतिक बदलावों का जायज़ा लिया। उन्होंने उम्मते-मुस्लिमा को एकता और आपसी भाईचारे की ज़रूरत की ओर ध्यान दिलाया।
उन्होंने कहा कि इस्लाम-विरोधी ताक़तों का मुकाबला करने के लिए उम्मते-मुस्लिमा का एकजुट होना समय की सबसे अहम ज़रूरत है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि मुस्लिम दुनिया अपने आपसी मतभेदों के कारण एक-दूसरे के सामने खड़ी दिखाई देती है। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि समाज में वास्तविक बदलाव की शुरुआत व्यक्ति के अपने सुधार, चरित्र-निर्माण और धार्मिक ज़िम्मेदारियों को निभाने से होती है।
अपने ख़ुत्बे के दौरान मौलाना सय्यद मंज़ूर रज़ा आबिदी ने यमन की स्थिति और वहाँ की मज़लूम जनता को पेश आने वाली कठिनाइयों का ज़िक्र करते हुए इस्लामी दुनिया की मौजूदा प्राथमिकताओं पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यह विचारणीय बात है कि उम्मते-मुस्लिमा इस्लाम-विरोधी ताक़तों के मुक़ाबले में एकजुट होने के बजाय एक मज़लूम और कमज़ोर देश के ख़िलाफ़ खड़ी दिखाई देती है। उनके अनुसार, यमन की जनता का धैर्य और दृढ़ता इस सच्चाई की याद दिलाती है कि केवल बाहरी साधन और भौतिक शक्ति ही सफलता का पैमाना नहीं हैं, बल्कि कमज़ोर समझी जाने वाली क़ौमें भी अपने संकल्प और हौसले से बड़ी ताक़तों को चुनौती दे सकती हैं।
इस सिलसिले में उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) और मंसूर दवानिक़ी का वाक़या बयान करते हुए मक्खी के ज़रिये एक घमंडी शासक को उसकी बेबसी का एहसास कराने की घटना की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि इंसान की ताक़त, सत्ता और हुकूमत हमेशा कायम नहीं रहती। इसलिए इंसान को अपनी शक्ति और अधिकार पर घमंड करने के बजाय अपनी वास्तविकता और अल्लाह तआला की क़ुदरत को ध्यान में रखना चाहिए।
अमेरिका की राजनीतिक स्थिति और ईरान के संबंध में उसकी नीतियों पर बात करते हुए मौलाना ने हालिया मध्यावधि चुनावों में सत्तारूढ़ दल को हुए नुकसान का उल्लेख किया। उन्होंने इसे सरकार की नीतियों, विशेष रूप से ईरान के संबंध में अपनाए गए युद्धोन्मुख रवैये के संदर्भ में पेश किया। उन्होंने कहा कि जनता अपने वोट के ज़रिये शासकों के फैसलों और नीतियों पर अपनी राय व्यक्त करती है, इसलिए जनभावनाओं और राजनीतिक फैसलों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
ख़ुत्बे के एक अहम हिस्से में उन्होंने आत्मसुधार और आंतरिक सुधार को सामाजिक बदलाव की बुनियादी शर्त बताते हुए नमाज़ और अज़ान की अहमियत पर विशेष ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि जब मोबाइल फ़ोन की घंटी बजती है तो इंसान तुरंत उसका जवाब देने की कोशिश करता है और थोड़ी-सी देर होने पर भी माफ़ी माँगता है, लेकिन अफ़सोस कि दिन में कई बार अल्लाह तआला की ओर से नमाज़ के लिए पुकारा जाता है, इसके बावजूद हम उस पुकार पर लब्बैक कहने में लापरवाही करते हैं। हमें अपने जीवन के तौर-तरीक़ों का जायज़ा लेना चाहिए और अल्लाह तआला की पुकार को अपनी प्राथमिकताओं में जगह देनी चाहिए।
उन्होंने हदीस की रोशनी में स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति अपने भीतर सुधार करता है, अल्लाह तआला उसके बाहरी जीवन को भी सुधार देता है। अल्लाह तआला ने इंसानों की हिदायत के लिए पैग़म्बरों, इमामों-ए-मासूमीन (अ.), उलमा, प्रचारकों और ख़तीबों के ज़रिये सभी आवश्यक साधन उपलब्ध कराए हैं, लेकिन व्यावहारिक बदलाव की शुरुआत इंसान को स्वयं अपने भीतर से करनी होगी। इसी सिलसिले में उन्होंने क़ुरआन मजीद के इस बुनियादी सिद्धांत की ओर इशारा किया कि अल्लाह किसी क़ौम की हालत उस समय तक नहीं बदलता, जब तक वह स्वयं अपनी हालत बदलने की कोशिश न करे।
मौलाना ने कहा कि घर, मोहल्ला, शहर, कपड़े और गाड़ी बदलने से इंसान का वास्तविक व्यक्तित्व नहीं बदलता, बल्कि असली बदलाव उसकी सोच, चरित्र और आंतरिक स्थिति में आना चाहिए। इसके लिए मज़बूत इरादे, लगातार मेहनत और व्यावहारिक दृढ़ता ज़रूरी है। अफ़सोस कि हम जुमे की नमाज़ में सुधार और नेक कामों का संकल्प लेते हैं, लेकिन मस्जिद से बाहर निकलते ही दुनिया की व्यस्तताओं में अपने इरादों को भूल जाते हैं।
बच्चों की तरबीयत के संबंध में माता-पिता को ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा कि बच्चे हमारी नसीहतों से ज़्यादा हमारे चरित्र और व्यावहारिक जीवन से सीखते हैं। यदि हम अपनी संतान को आज्ञाकारी, अच्छे अख़लाक़ वाली और दीनदार देखना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें अपने आचरण और चरित्र को सुधारना होगा, क्योंकि घर का माहौल और माता-पिता का व्यवहार बच्चों के व्यक्तित्व-निर्माण में बुनियादी भूमिका निभाता है।
सामाजिक अनुशासन और आपसी ज़िम्मेदारियों को स्पष्ट करते हुए मौलाना सय्यद मंज़ूर रज़ा आबिदी ने इंसानी शरीर का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह इंसानी शरीर के अलग-अलग अंग, जैसे आँख, कान, ज़बान, हाथ और पैर अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाते हैं और एक-दूसरे के काम में हस्तक्षेप नहीं करते, उसी तरह समाज में भी हर व्यक्ति को अपनी ज़िम्मेदारी और स्थान का एहसास होना चाहिए। जब हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों को सही ढंग से निभाएगा तो समाज में अनुशासन, संतुलन और सुंदरता पैदा होगी। इसके विपरीत, दूसरों के कामों में हस्तक्षेप, ईर्ष्या और अपनी सीमाओं से आगे बढ़ना सामाजिक अव्यवस्था और बिगाड़ का कारण बनता है।
शिक्षा की अहमियत और सामाजिक प्राथमिकताओं पर बात करते हुए उन्होंने अज्ञानता और ग़रीबी को इंसानी जीवन और समाज के दो बड़े दुश्मन बताया। उन्होंने कहा कि ज्ञान, शिक्षा और जागरूकता के ज़रिये इनका मुकाबला किया जा सकता है। उन्होंने समाज के इस रवैये पर अफ़सोस जताया कि कुछ परिवार बच्चों की शादियों, रस्मो-रिवाज और समारोहों पर लाखों रुपये खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन जब बच्चों की उच्च शिक्षा और पढ़ाई के खर्च की बात आती है तो संसाधनों की कमी का बहाना बनाया जाता है। उन्होंने इस सोच को सुधारने योग्य बताते हुए कहा कि हमें अपनी सामाजिक प्राथमिकताओं पर दोबारा विचार करना चाहिए और बच्चों के भविष्य, शिक्षा तथा तरबीयत को अनावश्यक रस्मो-रिवाज पर प्राथमिकता देनी चाहिए।
ख़ुत्बे के अंत में मौलाना सय्यद मंज़ूर रज़ा आबिदी ने मोमिनों को अपने आंतरिक सुधार, चरित्र-निर्माण, नेक इरादों पर दृढ़ रहने और अल्लाह तआला के आदेशों के अनुसार जीवन गुज़ारने का संकल्प लेने की दावत दी। उन्होंने इस सच्चाई पर ज़ोर दिया कि जब व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारियों को समझते हुए अपनी ज़ात, परिवार और सामाजिक भूमिका में सुधार करेंगे तो इसके सकारात्मक प्रभाव पूरे समाज में दिखाई देंगे।


















