जंगें केवल हथियारों से नहीं, बल्कि चरित्र और संकल्प से जीती जाती हैं

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जंगें केवल हथियारों से नहीं, बल्कि चरित्र और संकल्प से जीती जाती हैं

रांची के इमामे जुमा मौलाना सय्यद तहज़ीबुल हसन रिज़वी ने कहा कि आपसी सम्मान, अच्छे अख़लाक़ और एक-दूसरे का हौसला बढ़ाना सामाजिक तरक़्क़ी की बुनियाद हैं। ईरान के प्रतिरोध ने साबित किया है कि वास्तविक सफलता केवल हथियारों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि ईमान, चरित्र और दृढ़ संकल्प से हासिल होती है।

 झारखंड के रांची स्थित जामे मस्जिद जाफ़रिया के इमामे जुमा वल जमाअत हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सय्यद तहज़ीबुल हसन रिज़वी ने कहा कि इस्लाम इंसानों को एक-दूसरे के ऐबों पर पर्दा डालने, आपसी सम्मान करने और एक-दूसरे का हौसला बढ़ाने की शिक्षा देता है। उन्होंने कहा कि किसी की कमज़ोरियों को उजागर करने के बजाय उसकी इस्लाह की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि समाज की तरक़्क़ी आपसी सहयोग, अच्छे अख़लाक़ और सकारात्मक व्यवहार से ही संभव है।

उन्होंने झारखंड की प्रसिद्ध मस्जिद जाफ़रिया, अंसार नगर, रांची में नमाज़े जुमा से पहले तक़रीर करते हुए कहा कि अल्लाह तआला सत्तारुल उयूब है। वह इंसान के तमाम आमाल से वाक़िफ़ होने के बावजूद उसके ऐबों पर पर्दा डालता है। इससे स्पष्ट होता है कि मुसलमानों को भी एक-दूसरे की कमियों को उजागर करने के बजाय इस्लाह और ख़ैरख़्वाही का रास्ता अपनाना चाहिए।

ईरान की सफलता ने साबित किया कि जंगें केवल हथियारों से नहीं, बल्कि चरित्र और संकल्प से जीती जाती हैं: मौलाना सय्यद तहज़ीबुल हसन रिज़वी

मौलाना सय्यद तहज़ीबुल हसन रिज़वी ने कहा कि आज समाज में एक-दूसरे को नीचा दिखाने और ख़ुद को सबसे अधिक योग्य तथा बुद्धिमान साबित करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जबकि मौलाए कायनात हज़रत अली (अ.) की शिक्षाओं के अनुसार ख़ुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझना मूर्खता है। उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) की शिक्षाओं का हवाला देते हुए कहा कि किसी मोमिन की तरक़्क़ी और सफलता देखकर उससे ईर्ष्या करने के बजाय अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए कि उसने हमारे समाज के एक व्यक्ति को सम्मान और बुलंदी अता की है।

उन्होंने आगे कहा कि इंसान की वास्तविक महानता का पैमाना केवल ज्ञान और दौलत नहीं, बल्कि उसका अख़लाक़ और चरित्र है। समाज और क़ौम की भलाई के लिए काम करने वाले लोगों का हौसला बढ़ाना चाहिए, न कि उनकी टांग खींचने की कोशिश करनी चाहिए।

रांची के इमामे जुमा ने मिम्बरे रसूल (स.) की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इतिहास गवाह है कि दौर-ए-जाहिलियत में संचार के साधन उपलब्ध न होने के बावजूद मिम्बर के ज़रिये लोगों की वैचारिक और नैतिक इस्लाह होती रही है और आज भी यह सिलसिला जारी है। मिम्बर की बुनियादी ज़िम्मेदारी सच्चाई, तक़वा और नेक अमल की दावत देना है। हालांकि, यह दावत उसी समय प्रभावी हो सकती है, जब दावत देने वाला ख़ुद भी उन शिक्षाओं पर अमल करता हो।

ईरान की सफलता ने साबित किया कि जंगें केवल हथियारों से नहीं, बल्कि चरित्र और संकल्प से जीती जाती हैं: मौलाना सय्यद तहज़ीबुल हसन रिज़वी

विश्व की मौजूदा परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिका और इस्राइल ने अपनी ताक़त और श्रेष्ठता के घमंड में ईरान की व्यवस्था को बदलने की कोशिश की, लेकिन ईरान ने साबित किया कि वास्तविक सफलता केवल आधुनिक हथियारों से नहीं, बल्कि मज़बूत चरित्र, ईमान, संकल्प और व्यावहारिक दृढ़ता से हासिल होती है। उन्होंने कहा कि ईरान के प्रतिरोध ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई वास्तविकताओं को उजागर किया और दुनिया को यह संदेश दिया कि अहलेबैत (अ.) की शिक्षाओं पर चलने वाली क़ौमों को ताक़त के बल पर भयभीत नहीं किया जा सकता।

अंत में मौलाना सय्यद तहज़ीबुल हसन रिज़वी ने कहा कि यदि मुसलमान वास्तविक सफलता और सम्मान हासिल करना चाहते हैं तो उन्हें अहलेबैत (अ.) की शिक्षाओं को अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक ज़िंदगी का हिस्सा बनाना होगा तथा ईरान के अनुभव से भी सबक़ लेना चाहिए।

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