रहबर ए शहीद ने मेंहदवियत को खामोश इंतज़ार नहीं, बल्कि इंसाफ़, अमन और इंसानी तरक़्क़ी पर आधारित वैश्विक सभ्यता की स्थापना के लिए लगातार संघर्ष का नाम बताया। उन्होंने कहा कि इमाम ज़़माना हज़रत मेंहदी (अ.ज.) के ज़ुहूर से पहले आराम और चैन नहीं होगा, बल्कि अहले-ईमान को कठिन परीक्षाओं और संघर्षों से गुजरना पड़ेगा।
रहबर-ए-शहीद ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें ऐसे दौर के लिए तैयारी करनी चाहिए जिसमें ज़ुल्म और अत्याचार का अंत हो, इंसानों की बुद्धि और सोच पहले से ज़्यादा सक्रिय और रचनात्मक बन जाए और दुनिया की क़ौमें युद्ध और खून-खराबे के बजाय अमन और सुरक्षा के माहौल में जीवन बिताएं।
उन्होंने कहा कि आज दुनिया में युद्ध भड़काने वाली ताक़तें वही हैं जो अतीत में भी वैश्विक और क्षेत्रीय युद्धों का कारण रही हैं। लेकिन इमाम मेंहदी (अ.ज.) के ज़ुहूर के बाद उन्हें इंसानियत पर युद्ध थोपने की ताक़त नहीं रहेगी और पूरी दुनिया में वास्तविक शांति स्थापित होगी।
रहबर ए शहीद ने ज़ोर देकर कहा कि इस महान दौर को पाने के लिए लगातार कोशिश और क़ुर्बानी ज़रूरी है। उन्होंने रिवायतों का हवाला देते हुए कहा:
“وَاللّٰہِ لَتُمَحَّصُنَّ” اور “وَاللّٰہِ لَتُغَرْبَلُنَّ”
अर्थात मोमिनों को सख़्ती से परखा जाएगा और विभिन्न इम्तेहानों से गुज़ारा जाएगा।
उन्होंने आगे कहा कि ये परीक्षाएँ उसी समय होती हैं जब संघर्ष और जिहाद का मैदान तैयार होता है। ज़ुहूर से पहले नेक और पाक इंसान इलाही परीक्षाओं के दौर में दाख़िल होंगे, मुश्किलों और दबावों का सामना करेंगे और फिर कामयाब होकर निकलेंगे। इस तरह दुनिया धीरे-धीरे इमाम मेंहदी (अ.ज.) के वैश्विक न्याय और इंसाफ़ वाले दौर के क़रीब होती जाएगी।
रहबर-ए-शहीद के बयान, 30 बहमन 1370 हिजरी शम्सी, क़ुम मुक़द्दसा













