बहरैन में शिया समुदाय पर कड़ी कार्रवाई तेज

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बहरैन में शिया समुदाय पर कड़ी कार्रवाई तेज

बहरैन में हालिया गिरफ्तारियों, नागरिकता छीनने और राजनीतिक व धार्मिक मुकदमों की लहर ने देश की मौजूदा स्थिति को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है।

हाल के समय में क्षेत्रीय तनावों और ईरान को निशाना बनाकर की गई सैन्य-राजनीतिक घटनाओं के प्रभाव केवल युद्ध या राजनीति तक सीमित नहीं रहे, बल्कि खाड़ी क्षेत्र के कई देशों तक फैल गए हैं, जहाँ सुरक्षा कड़ी कर दी गई है और आंतरिक तनाव बढ़ा है।

रिपोर्ट के अनुसार, बहरैन सरकार पर आरोप लगाया गया है कि वह क्षेत्रीय परिस्थितियों का लाभ उठाकर सुरक्षा नियंत्रण बढ़ा रही है और विशेष रूप से शिया समुदाय को निशाना बना रही है। “14 फ़रवरी गठबंधन” के राजनीतिक प्रतिनिधि इब्राहीम अल-अरादी के हवाले से कहा गया है कि बहरीन लंबे समय से ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाए हुए है और हालिया क्षेत्रीय संघर्षों ने इस नीति को और तेज कर दिया है।

उनका दावा है कि बहरैन उन देशों में शामिल रहा है जिन्होंने ईरान के खिलाफ सैन्य और रणनीतिक गतिविधियों में अपने संसाधनों का उपयोग करने की अनुमति दी। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि सरकार एक ऐसा राजनीतिक नैरेटिव बना रही है जिसमें ईरान को मुख्य खतरे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि जनता को इस नीति पर सवाल उठाने की स्वतंत्रता नहीं दी जाती।

अल-अरादी के अनुसार, हाल के महीनों में सैकड़ों गिरफ्तारियाँ हुई हैं, जिनमें अधिकतर शिया समुदाय से हैं। आरोप है कि कई लोगों को उनकी धार्मिक और वैचारिक पहचान, विशेषकर ईरान या “विलायत-ए-फ़क़ीह” से जुड़ाव के संदेह पर हिरासत में लिया गया है। इससे समाज में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा हुआ है।

उन्होंने यह भी कहा कि यह कार्रवाई केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं, बल्कि धर्मगुरुओं, वक्ताओं और सामाजिक हस्तियों तक फैली हुई है। उनके अनुसार यह एक व्यापक और संगठित अभियान है जिसका उद्देश्य शिया समुदाय के सामाजिक और धार्मिक ढांचे को कमजोर करना है।

रिपोर्ट में यह भी आरोप है कि सरकार लोगों पर राजनीतिक वफादारी साबित करने और कुछ धार्मिक नेताओं से दूरी बनाने का दबाव डाल रही है। इसके चलते स्थिति को “अघोषित सुरक्षा स्थिति” जैसा बताया गया है।

इसके अलावा, धार्मिक गतिविधियों पर प्रतिबंध और मनोरंजन कार्यक्रमों को समर्थन देने की तुलना करते हुए इसे दोहरे मानदंड बताया गया है। कुछ सांसदों द्वारा विरोध के बावजूद उन पर दबाव डालकर पीछे हटने की बात भी कही गई है।

अंत में रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यह नीतियाँ न तो शिया समुदाय को कमजोर करेंगी और न ही क्षेत्रीय स्थिरता ला पाएँगी, बल्कि इसके बजाय सामाजिक तनाव और अधिक बढ़ सकता है।

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