आक्रमण के विरुद्ध ईरान का समर्थन एक धार्मिक कर्तव्य हैः मिस्री सुन्नी विद्वान

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आक्रमण के विरुद्ध ईरान का समर्थन एक धार्मिक कर्तव्य हैः मिस्री सुन्नी विद्वान

मिस्र के सुन्नी विद्वान और पूर्व वक़्फ़ मंत्रालय अधिकारी शेख़ सलामा अब्दुलक़वी ने कहा है कि ईरान एक मुस्लिम देश है। इसलिए अमेरिका और इज़राइल के हमलों के खिलाफ उसका समर्थन करना एक “धार्मिक और इस्लामी कर्तव्य” है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को हमेशा उस पक्ष के साथ खड़ा होना चाहिए जो अत्याचार का शिकार हो, न कि उस पक्ष के साथ जो आक्रमण कर रहा हो।

 क्षेत्र में जारी राजनीतिक तनावों के बीच शेख़ सलामा अब्दुलक़वी ने अरब खाड़ी देशों और ईरान के बीच विवादों पर टिप्पणी करते हुए ईरान के समर्थन को धार्मिक रूप से आवश्यक बताया।

मिस्र के सुन्नी विद्वान शैख़ सलामा अब्दुलक़वी, जिन्होंने मिस्र के राष्ट्रपति मुहम्मद मुर्सी के कार्यकाल (2012–2013) में वक़्फ़ मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता और सलाहकार के रूप में काम किया था, ने अपने निजी यूट्यूब चैनल पर दिए गए एक बयान में कहा कि अमेरिका और इज़राइल के दबाव और हमलों के खिलाफ ईरान का समर्थन करना केवल राजनीतिक पक्षधरता नहीं है, बल्कि यह एक धार्मिक और शरई कर्तव्य है।

अब्दुलक़वी ने इस सवाल के जवाब में कि “आप खाड़ी देशों में अपने भाइयों के मुकाबले ईरान का पक्ष क्यों ले रहे हैं?” कहा कि यह प्रश्न मूल रूप से ही गलत है, क्योंकि वर्तमान विवाद ईरान और खाड़ी देशों के बीच नहीं है।

उन्होंने कहा कि चाहे हम चाहें या न चाहें, चाहे हमें ईरान पसंद हो या न हो अंततः ईरान एक मुस्लिम देश है। यह देश अमेरिका जैसे गैर-मुस्लिम देशों और नेतन्याहू तथा उनके सहयोगियों के हमलों का निशाना बना हुआ है। यदि हम इस विषय को इस्लामी शरीअत और आस्था के दृष्टिकोण से देखें, तो एक मुसलमान कभी दूसरे मुसलमान के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता।

इस मिस्री विद्वान ने स्पष्ट किया कि उनकी सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात सहित खाड़ी देशों से कोई शत्रुता नहीं है। उन्होंने कहा कि उनका रुख धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित है, न कि राजनीतिक झुकावों या अस्थायी मतभेदों पर।

उन्होंने आगे कहा कि यदि अमेरिका सऊदी अरब या संयुक्त अरब अमीरात पर हमला करता है, तो वे बिना किसी संदेह के इन देशों के साथ खड़े होंगे, क्योंकि इस्लामी फिक़्ह के अनुसार जिस पक्ष पर हमला होता है, उसे आत्मरक्षा का वैध अधिकार प्राप्त होता है।

अब्दुलक़वी ने आगे कुछ अहम बिंदु को बयान किया जैसे

  • उन्होंने कहा कि आत्मरक्षा इस्लामी कानून और अंतरराष्ट्रीय नियमों दोनों में मान्य है।
  • उन्होंने फ़िलिस्तीन और ग़ज़ा के लोगों को छोड़ दिए जाने पर अरब देशों की आलोचना की।
  • उन्होंने कहा कि ईरान ने फ़िलिस्तीन और प्रतिरोध आंदोलन का समर्थन किया है, इसलिए उसके प्रति सम्मान होना चाहिए।
  • उन्होंने सऊदी अरब और क़तर जैसे देशों में युद्ध-विरोधी रुख को सकारात्मक बताया।

उन्होंने यह भी कहा कि जो अरब विचारक यह मानते हैं कि इज़राइल के कारण ईरान से संबंध खराब नहीं होने चाहिए, वे सही सोच रखते हैं।

अंत में उन्होंने कहा: “अमेरिका एक अत्याचारी आक्रमणकारी है, और हम हमेशा उसी पक्ष का समर्थन करते हैं जो मज़लूम होता है, न कि आक्रमणकारी का। जहाँ भी सत्य होगा, मैं हमेशा उसी पक्ष के साथ खड़ा रहूँगा। धार्मिक और राजनीतिक मतभेदों को क्षेत्रीय संकटों के संबंध में नैतिक और शरई दृष्टिकोण पर हावी नहीं होने देना चाहिए।”

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