प्रसिद्ध आरिफ़ मरहूम शेख़ जाफ़र मुज्तहिदी ने इमाम ज़माना हज़रत इमाम महदी (अ.) से तवस्सुल करने और अपनी हाजत पूरी होने के लिए एक विशेष तरीका बताया है। इसमें हज़रत नरजिस ख़ातून (स.) के वसीले से इमाम ज़माना (अ.) से मदद माँगने की हिदायत दी गई है।
अहलेबैत (अ.) से तवस्सुल करना मोमिनों के लिए कठिनाइयों और परेशानियों में मदद प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। आरिफ़ों और बुज़ुर्गों ने अपनी शिक्षाओं और अनुभवों के आधार पर तवस्सुल के विभिन्न तरीके बताए हैं। इसी सिलसिले में प्रसिद्ध आरिफ़ मरहूम शेख़ जाफ़र मुज्तहिदी से जुड़ा एक वाक़या और उनकी बताई गई विशेष हिदायत प्रस्तुत की जा रही है।
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद हुसैन हाशमीनेजाद नक़्ल करते हैं:
एक दिन मेरे एक छात्र मित्र अपनी एक अत्यंत महत्वपूर्ण हाजत के सिलसिले में मेरे पास आए। उन्होंने अपनी परेशानी बताने के बाद अनुरोध किया कि हम दोनों शेख़ जाफ़र मुज्तहिदी की सेवा में उपस्थित हों, ताकि उनसे मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें। मुझे महसूस हुआ कि उनकी हाजत वास्तव में उनके जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए मैंने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया और हम शेख़ मुज्तहिदी के घर पहुँच गए।
शेख़ साहब बीमार होने के बावजूद बड़ी आत्मीयता और स्नेह के साथ हमसे मिले। जब हमने उनके सामने पूरी बात रखी, तो उन्होंने मेरे मित्र से फ़रमाया:
आप मस्जिदे जमकरान जाएँ और इमाम ज़माना (अ.) से मंसूब नमाज़ अदा करें। इस नमाज़ का सवाब हज़रत इमाम ज़माना (अ.) की वालिदा मोहतरमा हज़रत नरजिस ख़ातून (स.) की पवित्र आत्मा को भेंट करें।
नमाज़ के बाद सजदे में पढ़े जाने वाले सलवात पूरे करने के पश्चात क़िबला रुख़ बैठें और 313 बार «या हुज्जतल्लाह» कहें। इसके बाद हज़रत नरजिस ख़ातून (स.) से इस तरह अर्ज़ करें:
“आप अपने प्रिय पुत्र इमाम ज़माना (अ.) से फ़रमाएँ कि वे मेरी परेशानी दूर कर दें।”
शेख़ मुज्तहिदी ने आगे फ़रमाया कि माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करना और उनका सम्मान करना वाजिब है। इसलिए हज़रत नरजिस ख़ातून (स.) के वसीले से इमाम ज़माना (अ.) से अनुरोध किया जाए, तो इंशाअल्लाह, हज़रत अवश्य कृपा फ़रमाएँगे।
सैयद हुसैन हाशमीनेजाद आगे बयान करते हैं कि शेख़ मुज्तहिदी की हिदायत सुनने के बाद हम वहाँ से वापस आ गए। उसी दिन शाम के समय मेरे मित्र मस्जिदे जमकरान गए और बताए गए तरीके के अनुसार नमाज़ और तवस्सुल अदा किया। अगले ही दिन वे मेरे पास आए और यह ख़ुशख़बरी सुनाई कि इमाम ज़माना (अ.) के लुत्फ़ो-करम से उनकी बड़ी परेशानी आसानी से हल हो गई है।
वे आगे कहते हैं कि इस घटना को लगभग बीस वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान मैंने स्वयं भी कई बार इसी तरीके से तवस्सुल किया और दूसरों को भी इसकी हिदायत दी। अल्लाह के फ़ज़्ल और इमाम ज़माना (अ.) के लुत्फ़ो-करम से उनकी हाजतें पूरी हुईं।
स्रोत: लालेई अज़ मलकूत, जिल्द 3, पृष्ठ संख्या उपलब्ध नहीं।













